Saturday, February 4, 2012

किस पर करे आधार ?

ग्लोबल हुआ बाज़ार !


[कृपया हमें वापरें…व्यापार करें….....शब्दों की आवाजाही, 'शब्दों का सफ़र' से  ...'आत्ममंथन' पर भी होती रहती है....]

मुल्को की तरक्की का पैमाना है 'व्यापार',
इम्पोर्ट है 'इस पार' तो एक्सपोर्ट है 'उस पार'.


'व्यापार' में घोटाले है, 'घोटालो' का व्यापार,
इन्साफ करे कौन ? जब ताजिर बनी सरकार.

करता है 'सफ़र' माल तो संग चलती है तहज़ीब*          [ *संस्कृति] 
'शब्दों' का भी 'व्यापार' से होता है सरोकार.

रंग भरता ज़िन्दगी में, नयन होते है जब चार,
'cupid'  भी कर रहा है ,यहाँ देखो कारोबार.


"उपयोग करो - फेंको" , का अब दौर है ये तो,
इन्सां भी लगे अबतो 'मताअ', कूचा-ए-बाज़ार.

तहज़ीब के, क़द्रों के, क़दर दान बहुत कम, 
दौलत का सगा है कोई, मतलब से बना यार.
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--mansoor ali hashmi 

'धोया' किसी ने भी हो 'सुखाया' हमीं ने है !


'धोया' किसी ने भी हो 'सुखाया' हमीं ने है !


गणतंत्र का मज़ाक उड़ाया हमीं ने है,
भ्रष्टो को सर पे अपने बिठाया हमीं ने है.

जो लूट कर चले गए, वो तो थे ग़ैर ही,
फिर उसके बाद; लूट के खाया हमीं ने है.

खेलो में हार-जीत तो होती ही रहती है !
दोनों ही सूरतो में कमाया हमीं ने है !!


"घोटाला करके बच नहीं सकता कोई यहाँ"
इस 'सच' को कईं  बार 'झुठाया' हमीं ने है !

'थप्पड़' भी खाके, दूसरा करते है 'गाल' पेश,
घर जाके 'बादशा'* को मनाया हमीं ने है.        *SRK
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--mansoor ali hashmi 

Wednesday, January 25, 2012

एक जश्ने बा वक़ार है छब्बीस जनवरी

गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई , इस अवसर पर अहमद अली बर्की साहब की एक नज़्म उनकी इजाज़त लेकर पेश कर रहा हूँ:- म. हाश्मी.


[Saheb e Akhtiyar haiN Mansoor Aap ko akhtiyar hai is ka
Shukriya Janab e aali is nawaazish ke liye.
Mukhlis
Ahmad Ali Barqi आज़मी]


एक  जश्ने  बा  वक़ार है छब्बीस जनवरी 



                                                     - By  AHMAD ALI BARQI AZMI


एक जश्ने बा वक़ार है छब्बीस जनवरी, 

इक वजहे इफ़्तेख़ार है छब्बीस जनवरी.


परचम कुशाई कीजिये हरजां बसद ख़ुलूस, 

मीज़ाने ऐतेबार है छब्बीस जनवरी.


दस्तूरे हिंद का था इसी दिन हुआ नेफाज़*             *[लागू] 

इस की ही यादगार है छब्बीस जनवरी.


दुनिया में है जो हिंद की अज़मत का इक निशाँ 

वोह जश्ने शानदार है छब्बीस जनवरी.


गुल्हाए रंग रंग हैं इसके नज़र नवाज़,

सब के गले का हार है छब्बीस जनवरी.


सब के सुकूने क़ल्ब का बाईस हो यह न क्यों 

इक नख्ले साया दार है  छब्बीस जनवरी.


जितना भी दिल लगाना है इस से लगाइए 

बस प्यार, प्यार, प्यार है  छब्बीस जनवरी.


जितना भी कोई नाज़ करे इस पे है वोह कम 

'बर्की' तेरा वक़ार है  छब्बीस जनवरी. 

--डा. अहमद अली बर्की आज़मी   


Thursday, January 12, 2012

एक दे , होता डबल ! है, आजकल


एक दे , होता डबल ! है, आजकल 
['शब्दों का सफ़र' का 'बेंडा' शब्द  भी ब्लॉग रचने में सहायक होता है !...http://shabdavali.blogspot.com] 

एन्डे-बेंडे चल रहे है आजकल,
'हाथी-गेंडे' छल रहे है आजकल.

एड़े-गैरे की यहाँ पर पूछ है,
वड्डे-वड्डे जल रहे है आजकल.

'येड़े' बालीवुड में होते है सफल,
हीरो को देखा विफल है आजकल.

मूर्खता और बुद्धिमत्ता साथ-साथ,
अर्थ 'येड़ा' के डबल है आजकल.

‘एड्डु’- ‘इड्डु’ रह गए पीछे बहुत,
"येद्दू-रेड्डी"  ही 'कमल' है आजकल !

बातें 'समृद्धि' की  है चारो तरफ !
नेत्र 'माँ' के क्यों सजल है आजकल ? 

ऐसे-वैसे, कैसे-कैसे हो रहे !
रत्ती, माशा भी 'रतल'*  है आजकल.     (* १ पाउंड/आधा सेर)

बिजली का संकट यहाँ पर इन दिनों,
सूने-सूने नल रहे है आजकल.

'हाथ' तो 'हाथी' कभी, जो अब 'कमल',
दल-बदल ही दल-बदल है आजकल. 


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Mansoor ali Hashmi 

Sunday, November 20, 2011

T.R.P. बढ़ाने को बोटल में 'जीन' है !

T.R.P.  बढ़ाने को लाये क्या 'सीन' है  !






पंद्रह की हो गयी है, बला की हसीन है,
Fixing पे  'काम्बली' को अभी तक यकीन है.

Message मिल रहा है हवाओं से 'Ball' को,
'पैसों' से खेलती अब 'रनों की मशीन' है.  

'प्लेयर' को देर से सही आया है होश तो,
'बोर्ड' अपना, कुंभ्क्रनीय निंद्रा में लीन है.

कोहरे की ज़द में आ गया दिल्ली पहुँच के 'रथ'
 'PM in Waiting' है कि यहाँ तीन-तीन है.


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mansoor ali hashmi 

Tuesday, November 8, 2011

B. P. L.



ये किसका इंतज़ार है ?


ग़रीबी रेखा पार करने में जो मददगार है,
उसी  में भ्रष्टाचार है, उसी से भ्रष्टाचार है.

शिकारी भी भ्रष्ट गर शिकार भ्रष्टाचार है. 
वो कह रहे है अब तो ये लड़ाई आर-पार है.

वो चाह इन्किलाब की तो कर रहे मगर यहाँ, 
बने है अनशनो के रास्ते,  तो  त्यौहार है. 

समीकरण है ठीक, बात फिर  भी बन नहीं रही,
यहाँ है चौकड़ी अगर, वहां भी यार चार है.

हरएक टोपी छाप की दवा नहीं है कारगर,
है अन्ना केवल एक, और मरीज़ तो हज़ार है.

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--mansoor ali hashmi 

Saturday, November 5, 2011

Hiccup


हिचकियाँ !



अजित वडनेरकर जी की आज की पोस्ट

 से प्रभावित होकर, जो हिचकियाँ आ रही है उससे "आत्म-मंथन' को तो 
प्रभावित होना ही था:-


याद इतना कर रहा है कौन आज !     

'हिचकियाँ ही हिचकियाँ' आती रही.


# 'हिचकिचाते' ,'सिमट' वो जाते थे,
फिर भी हम को बहुत वो भाते थे,
अब जो आकर पसर गए है वो,
देखिये हम 'सिमटते' जाते है.
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# ले के 'हिचकी' वो सब 'डकार'  गया 
गीला-सूखा सभी उतार गया,
'हाथ धोकर' ही जैसे आया था !
हाथ फिर धोये और पधार गया !! 
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# 'बेहिचक' होके वो लताड़ गया,
उसका खाया-पिया बिगाड़ गया,
सर पे टोपी लगी थी अन्ना की,
'लोक्पाली' से डर 'लबाड़' गया.
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# उसने पूछी है बात दिल की मेरी,
मैं 'हिचकते' रहा; कहूँ, न कहूँ ? 
एक 'हिचकोला' खाके बस जो रुकी,
वो उतरली; मैं, अब रुकू के चलू ?

#  बिसरो की जो याद दिलादे 'हिचकी' है,
'श्वास' का जो व्यवधान बतादे हिचकी है,
बातो से तो दावा होश का करता है,
चढ़ी है कितनी इसका पता दे ,हिचकी है.

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-मंसूर अली हाश्मी 

Friday, November 4, 2011

Broken Heel


केले का छिलका 



 आज उसका बैंक में ड्यूटी पर जाने का पहला दिन था. लोकल ट्रेन से उतर कर पुलिया के रास्ते से बैंक तक जाने का एक मात्र और सीधा रास्ता अपेक्षाकृत कम ट्रेफिक वाला और सूना था.  होटले और कुछ छोटी दुकाने खुली हुई थी. वह कुछ क़दम ही चली थी कि रास्ते के बीच पड़े हुए केले के छिलके पर उसकी नज़र गयी. अचानक रुक कर जो वह छिलका उठाने को झुकी तो उसकी ऊंची एड़ी की सेंडिल जवाब दे गयी. गिरने से तो उसने ख़ुद को बचा लिया लेकिन एक सेंडिल की एड़ी चटक गयी. अब उसके पास दूसरी सेंडिल भी उतार कर हाथ में लेने के अलावा कोई चारा न था. दोनों सेंडिल उठाने के बाद उसने आस-पास नज़र डाली कि कोई देख तो नहीं रहा है, कुछ चलते हुए राहगीर और ठहरे हुए लोगो का अपनी और ध्यान आकृषित देख वह खिसिया सी गयी. चाह कर भी वह टूटी हुई एड़ी उठाने का साहस न जुटा सकी. हाँ, केले के छिलके पर क्रोध भरी नज़र अवश्य डाली जिसके कारण यह मुसीबत सामने आई.
अब वह नंगे पांव पहला डग भरती इसके पहले ही सामने से आकर एक स्कूटर ठीक उसके पास रुका. चालक नौजवान ने कहा, "बैठिये, कहाँ जाना है आपको?" युवती बैठने लगी तो वह बोला, "एड़ी भी ले लीजिये, वापस लग जायेगी."  आदेशात्मक लहजा था, उसकी बात मानते ही बनी, मगर उसने अब साथ में केले का छिलका भी उठा लिया और सड़क किनारे फेंक दिया. राहगीरों और होटल के बाहर खड़े लोगों का देखना अब उसे नहीं खल रहा था. वह झट से स्कूटर पर सवार हो गयी जैसे किसी परिचित के साथ जा रही हो. स्कूटर आगे बढ़ाते हुए युवक ने पूछा, "मेडम कहाँ तक जाना है ?"  "इसी सड़क के अंत तक जहां मेरा बैंक है, परन्तु..."
"नंगे पांव वहां नहीं जा सकती", युवक ने उसकी बात पूरी करदी. 
"जी हाँ, और आज तो ड्यूटी पर मेरा पहला दिन ही है, मैं वहां तमाशा बन जाउंगी."
मरम्मत की कोई दुकान आस-पास नज़र नहीं आ रही थी, जूतों की कोई बड़ी दुकान भी अभी खुली हो; एसा नहीं लगता था.  किसी छोटी दुकान पर स्लीपर मिलने के चांस थे. एसी ही एक दुकान के सामने उसने स्कूटर रोक दी और स्लीपर खरीद ली, ताकि खुले पांव न चलना पड़े. युवक ने जाने की इजाज़त चाही. बैंक खुलने में अभी  भी १५ मिनिट की देर थी. युवती ने उसे पास ही दिख रहे एक रेस्टोरेंट में चाय की दावत दे डाली.. चाय पीते  समय ही दोनों ने एक दूसरे के नाम जाने. "काम" ? "मेरी ख़ुद की ही लेडिस जूतों की एक दुकान है."
"तो फिर एक लड़की को जो बैंक में सर्विस करने जा रही हो , स्लीपर क्यूँ दिलवा दिये?" 
"बात दरअस्ल यह है कि जहां आपकी सेंडिल टूटी,  ठीक उसके सामने ही मेरी दुकान है, मैं दुकान खोलने ही के लिए वहां पहुंचा था कि आपको इस हालत में पाया. अब ऐसे में अपनी ही दुकान पर आपको कुछ खरीदने की ऑफर देता तो ये ठीक वैसा ही होता जैसे पंक्चर बनाने वाले ने कीले बिखेर कर ट्यूब पंक्चर करवा दिया हो और फिर मेरा तो यह ख़याल था कि आपको अपने घर या  कहीं पहुंचना ही है तो पहुंचा दूँ , फिर अपनी दुकान खोल लूंगा."
लता, महमूद की बात पर दिल खोल कर हंसी फिर बोली, "चलो तो अब चलते है, मैं सेंडिल वही से खरीदूंगी."  महमूद झट से बोंल पड़ा, "नहीं-नहीं, आस-पड़ोस वाले सब देख रहे थे, अब आपको वापस लेकर गया तो जाने क्या-क्या बातें होगी, मैं शादी-शुदा आदमी हूँ." 
फिर वह लता को वही छोड़, दुकान जाकर उसकी साईज़ की सेंडिल ला कर समय से लता को बैंक पहुंचा दिया.

शिक्षा:- इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि - कभी जूते कि दुकान के सामने केले का छिलका नहीं फेंकना चाहिए !

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mansoor ali hashmi 

Sunday, October 16, 2011

Silent Cry !


शौरे खमोशा !
   'येद्दु' Indoor, 'रथ'  है outdoor,
      एक इस छोर , एक है उस छोर,
      गाड़ी आगे बढ़े तो अब कैसे ?  
      दोनो जानिब ही लग रहा है ज़ोर !



   'अन्ना' खामोश, 'आडवानी' मुखर,
     एक बैठे है, एक मह्वे सफर,
     इक* पिटे, दूजे* को भी; लगता डर,
     आई 'आज़ान' अल्लाहो-अकबर !  

 * प्रशान्त भूषण,  * केजरीवाल



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-Mansoor ali Hashmi

Monday, October 3, 2011

QUATRAIN



"चोक्के"

आज  के 'दैनिक भास्कर' , समाचार पत्र की सुर्खी से प्रेरित;-  


आधी ! भी 'क्लीन चिट' अभी मिलती है यहाँ पर,
'अम्मा' हो मेहरबान तो 'अंबानी' को राहत.
'प्रणब' हो कि 'पी.सी' कोई 'दिग्गी' हो कि 'गहलोत',  
एक शर्ते 'वफादारी' है बस, पाने को 'चाहत'. 
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घोटाले बढ़े देश में, और फैली  है दहशत,
'बाबा' भी निकल आये है अब छोड़ के 'कसरत',
अब एक नया 'गांधी' भी बेदार हुआ है,
पाले हुए कितने ही है 'पी. एम्.' की हसरत.
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अब देखो बदलता है... कब ऊंट ये करवट !
'चारे'* की तो रहती है, हरएक को ही ज़रूरत,         *सत्ता सुख 
कौशिश में लगे है कि उलट फेर तो हो जाए,
उम्मीद के हो जाएगी हरकत से ही बरकत.
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अब कूँए को उल्टा के बना डाला है टंकी,
रस्सी की ज़रूरत नहीं, होते नहीं पनघट,
गगरी, न डगर सूनी, न गौरी की मटक है,
'बाइक' पे भटकते फिरे बेचारे, ये नटखट.
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-मंसूर अली हाश्मी