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Friday, September 30, 2011

Genius !


ये तो नही चमचागिरी ! 




उसने कहा करता है क्या ? 
मैंने कहा, ब्लागिरी....

उसने कहा मिलता है क्या?
मैंने कहा शोहरत बढ़ी!

उसने कहा लिखता है क्या?
मिथ्या ही सब, मिथ्या गिरी!

उसने कहा पढ़ता है कौन?
मैंने कहा 'उड़न-तश्तरी !

उसने कहा सीखा भी कुछ?
मैंने कहा दादागिरी!

उसने कहा "भैया प्रणाम" !
मैंने कहा बला टली!!

Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. 
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}
--mansoor ali hashmi 

Jab Bloggers Met


जब ब्लोगर Met


खो गए थे मेले में !
मिल गए अचानक  फिर,
इक नई ही दुनिया में,
बनके अबकि आभासी !!

रोज़ मिल भी जाते है,
बात हो भी जाती है,
अपने ही ब्लागों पर,
सारे लोग प्रवासी.

ज्ञान देने  आते है,
संज्ञान लेके जाते है,
इक से एक याँ बढ़कर,
लोग सारे जज़्बाती.

पूर्वी है अगर कोई,
कोई इनमे मद्रासी,
उर्दू दां कोई है तो,
है कोई ब्रज भाषी.

हिंदी सब ही लिखते है,
बोलते भी, पढ़ते भी,
प्यार इससे करते है,
'हिंदी ब्लॉग' के वासी.

सोच है अलग सबकी,
पेशा भी जुदागाना,
भिड़ भी जाते है अक्सर,
फितरतन करामाती.

डाक्टर भी है इनमे,
सी.ए., बी.ए., एम्.ए.भी,
है कोई गृहस्थिन तो,
कोई इनमे व्यापारी.

रचता है अगर साहित्य,
ज्ञान भी यहाँ बटता,
मेल दिल के होते है,
ख़ुश रहे मुलाकाती.


Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. 
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}
-- mansoor ali hashmi 

Thursday, September 29, 2011

Blogging Nuisance !


हंगामा कैसे बरपा करे !

लिखता मैं इसलिए हूँ कि कोई पढ़ा करे,
पढ़ता मैं इसलिए हूँ कि फिर और क्या करे!

Stamps जमा करता था,अब 'टिप्णियो' को मैं,
हो आपको भी शौक़ तो मुझको दिया करे !

उपदेश देने बैठे तो सूखे का हो शिकार,
'छीले' कोई किसी को तो दरिया बहा करे.

आघात, भावनाओं पे कोमल किया करो,
तोड़ो जो छत्ता ; डंक, मधु भी मिला करे.


लिखना जो भूल जाओ तो , गाली तो याद है,
इक देके उसके बदले में दस-दस लिया करे !




Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}
mansoor ali hashmi 

Monday, June 27, 2011

Hodge-Podge


अब करे तो क्या?

लगता नहीं है जी मैरा अबतो ब्लॉग में,
शब्दों में वायरस है , छुपे अर्थ fog में.

होने लगा शुमार अब लिखना भी रोग में,
किस्मत अब आजमाए चलो अपनी योग में. 

हम ढूँढते नहीं इसे अपनों या ग़ैर में,
अब तो सिमट गयी है वफाए भी Dog में.

पहले तलाशे मोक्ष का साधन ही त्याग था,
अब खोजा जा रहा है उसे सिर्फ भोग में.

था सच का बोल बाला तो झूठे थे शर्मसार,
शर्मो हया बची है अब गिनती के लोग में 

mansoor ali hashmi 

Thursday, January 27, 2011

post blog on mobile

MY POSTS PUBLISHED AT FOLLOWING SITE WILL NOW BE  AVAILABLE ON MOBILES TOO.
http://aatm-manthan.com          

--
mansoorali hashmi
mobile no.  09893833286

Thursday, September 23, 2010

श्रृद्धा और सबूरी

श्रृद्धा और सबूरी 

ब्लोगर, ब्लोगर, ब्लोगर्र,
लिख लिया? शिघ्र पोस्ट कर, 
आएगा कोई तो 'जाल'' पर,
सैंकड़ो है तेरे 'चारा'- गर,
हो न मायूस तू एक पल,
सब्र कर, सब्र कर, सब्र कर.

टिप्पणी, टिप्पणी, टिप्पणी,
एक दो, मुझसे लो दो गुनी,
"बहुत बढ़िया", बहुत ले लिया,
उससे होती नहीं सनसनी,
पोस्ट १२ बजे क्या लगी,
शून्य पर है टिकी टिप्पणी!

क्यों विकल, क्यों विकल, क्यों विकल,
'बाबरी' या जनम-स्थल?
कौन होगा यहाँ कल सफल,
सर से ऊंचा हुआ अबतो जल,
कर ले  मंजूर सब एक हल,
हॉस्पिटल, हॉस्पिटल, हॉस्पिटल!!! 


--
mansoorali hashmi

Wednesday, September 8, 2010

वाह! ब्लॉगर....

वाह! ब्लॉगर....

बिल्लियाँ बन बैठे है कुछ तो ब्लोगेर्स  आजकल,
जब कोई चूहा दिखा करते सफाचट आजकल.

जब कोई 'बच्चा'* दिखा देते गटागट* आज कल ,  
टीपके, टिपियाके कुछ चढ़ते फटाफट आजकल.

पेन को तलवार सी चमका के रक्खे  हर घड़ी,
धर्म ही को धर्म से कैसी अदावत आजकल.

'फैसले ' पर "फ़ैसला" लिखने को कुछ बेताब है,
तीखी होती जा रही उनकी लिखावट आजकल.

शब्दों की  खेती पे चलने कैंचियाँ तैयार है,
अपना-अपना उस्तरा अपनी हजामत आजकल.

धर्म हो या देश या ईमान या कि अस्मिता,
काठ की तलवार से करते हिफाज़त आजकल.
 
कम लिखो, न भी लिखो तो फर्क कुछ पड़ता नहीं,
खाली टिपयाने से भी मिलती है शोहरत आजकल.

'लेखिकाएं' Bold  होती जा रही है इन दिनों,
लेखको में दिख रही अबतो नज़ाक़त आजकल.

अब ब्लागों के 'ब्लाको' से ही घर बनने लगे,  'Blocks'
हार्द्वेअरी 'सोफ्ट' ही बनता सिलावट आजकल.

शब्द बेदम भी हो जिनकी साईटे गर आकर्षक,
वो भी चर्चा में है जो करते सजावट आजकल.     

ईंट इक की, दूसरे से लेके रोढ़ा इन दिनों,
"आत्म-मंथन" छोड़ क्यूँ करते हिमाकत आजकल?

  [*नया ब्लोगर, * candy]
 
-- mansoorali hashmi

Friday, September 3, 2010

कुछ तो करना ही पड़ता!

कुछ तो करना ही पड़ता!

"धान के देश"  में अवधिया जी के सवाल....


सठियाने वाली उम्र में ब्लोगिंग कर के तू कौन सा तुर्रमखां बन जाएगा?


....का जवाब ढूंढने की कौशिश ......
लिखते न गर ब्लॉग तो क्या कर रहे होते?
टी.वी. के चेनलो पे गुज़र कर रहे होते.


योगा कोई, कसरत तो कराटे की मदद से,
'सिक्स पेक' बना ख़ुद पे नज़र कर रहे होते.

उपदेशो हिकायात  श्रवन करके गुरु से,
'सात्विकता'! से जीवन को बसर कर रहे होते.

चाणक्य-नीति सीख विशेषज्ञों की मदद से,
कुछ बात इधर की वो उधर कर रहे होते.


और ब्लोगरियाँ:-
तकलीफे 'अक्षरा'* से परेशाँ जो कईं तो   
'प्रतिज्ञा'* के 'ससुरे' से कईं डर रही होती, 

रेंपो पे  निहारा जो 'करीना' को जलन-वश,
'कमरों' को वो अपनी भी कमर कर रही होती.

*star plus  के सीरियल्स  

--
mansoorali hashmi

Sunday, May 16, 2010

बड़ा कौन ?


बड़ा कौन ?

किस 'बला' में है मुब्तला 'गीरी'*       [ब्लागीरी]
झाड़ या फूंक ही करा लीजे.

फंकी चूरण की लो जो पेट दुखे,
सर दुखे बाम ही लगा लीजे.

समझ नही आता तकलीफ कहाँ पर है? हिन्दी ब्लागिंग में जो उठा-पटक चल रही है , अफ़सोस क विषय है. अपनी खामोशी कुछ इस तरह तौड़  रहा हूँ:-

'गल' में 'गू' आ गया है क्या कीजे?
थूंक कर चाटना, सज़ा कीजे.


किसको छोटा किसे बड़ा कीजे.
सब बराबर है अब मज़ा कीजे

बलग़मी  है सिफत बलागों की,
थूंक कर साफ़ अब गला कीजे.

जो है लेटा उसे बिठाना है,
बैठने वाले को खड़ा कीजे.

यूं तो ठंडक थी 'उनके' रिश्तो में, 
बढ़ गया ताप अब हवा कीजे.


ख़ामशी ओढ़ने से क्या मतलब,
दिल दुखा है अगर दवा कीजे.


हर बड़े पर ये बात वाजिब है,
जो है छोटा उसे क्षमा कीजे. 

फिर न हो पाए ऎसी उलझन अब,
आइये मिलके सब दुआ कीजे.

mansoorali हाश्मी
http://atm-manthan.com

Wednesday, April 21, 2010

क्यों?/Why?


क्यों?


ब्लॉगर भी  ज़हर फैला रहा है!
जो बोया है वो काटा जा रहा है.

धरम-मज़हब का धारण नाम करके ,
भले लोगों को क्यों भरमा रहा है.

अदावत, दुश्मनी माज़ी की बाते,
इसे फिर आज क्यों दोहरा रहा है.

सहिष्णु बन भलाई है इसी में,
क्रोधी ख़ुद को ही झुलसा रहा है.

हिफाज़त कर वतन की ख़ैर इसमें,
तू बन के बम, क्यों फूटा जा रहा है.

न  भगवा ही बुरा,न सब्ज़-ओ-अहमर*,
ये रंगों में क्यों बाँटा जा रहा है.

बड़ा अल्लाह , कहे भगवान्, कोई;
क्यूँ इक को दो बनाया जा रहा है. 

मिले तो दिल, खिले तो फूल जैसे,
मैरा तो बस यही अरमाँ रहा है.

*अहमर=लाल 
-मंसूर अली हाश्मी 

Monday, September 14, 2009

Blogging-4

बलागियात-4

[पूर्व प्रकशित - संपादित/संवर्धित , Blogging लेबल पर अन्य रचनाओं के लिए:-
visit .... http://mansooralihashmi.blogspot.com/search/label/Blogging

टेक्नीकल ब्लॉग बनते है,
मेकेनिकल ब्लॉग बनते है,
पॉलिटिकल ब्लॉग बनते है,
हिस्तरिकल ब्लॉग बनते है.

टेक्निक  को सरल बनाता ब्लॉग,
कागजी भी मशीन चलाता ब्लॉग,
झूठ-सच को उलट-पलट करता,
'इति' को 'हास' [य] में बदलता ब्लॉग।


सच का पैमाना ले के बैठेंगे,
झूठ को बर्फ से भी तोलेंगे,
छोड़ कर हम तो north-south को,
सिर्फ़ अपनी ही पोल [pole] खोलेंगे।


'न्याय'* का दम तो हम भी भरते है,
' दाल-रोटी' से प्यार करते है,
'भडास' हम भी निकाल ही लेंगे,
इसी पर्यावरण में पलते है।

वो जो 'छींटे' उड़ा रहा है कहीं,
हमको तकनीक भी सिखाता है,
और 'तकनीक दृष्टा' एक जनाब,
इक ग़ज़ल रोज़ ही सुनाता है.


बैठने से ज़्यादा उड़ता है,
क्या गज़ब तश्तरी पे करता है.
Nostalgia का हो के शिकार,
इन दिनों खूब आह भरता है.


गौ के एक स्वामी भी है यहाँ,
पुस्तकों को भी अब तो पाले है.
धूम उनकी ग़ज़ल की रहती है,
उनके उस्ताद भी निराले है.

एक शब्दों के जादूगर भी है,
नाम और काम से वो 'कर' भी है.
'ताऊ' है, 'भाऊ' और 'सीमा' है ,
एक ब्लॉगर जी चिपलूनकर भी है.

बादलों से भी झांकता प्रकाश,
राज़ बतलाती रजिया आपा है ,
दत्त जी झान बाँटते हरदम,
पूरी संगीतमय संगीता है.

वाणी होती नशर ब्लागों की,
चिट्ठो से है भरा जगत सारा,
सेवा भाषा की सब ही करते है,
जो न टिप्याया वह गया मारा.

कुछ विषय का यहाँ नही टौटा
जो लुढ़क जाए बस वही लोटा,
Dust Bin ही नही तो डर कैसा,
चल जो निकला नही रहा खोटा.


आओ बैठे , ज़रा सा गौर करे,
पहले हम ख़ुद को ही तो bore करे,
छप ही जाएगा नाम चित्र सहित,
पीछे चिल्लाये कोई शोर करे!


नर को नारी बनादो चलता है,
बिल को खाई बतादो चलता है,
तिल से हम ताड़ तो बनाते है,
राई होवे पहाड़ चलता है।

-मंसूर अली हाश्मी
[नोट:. inverted coma के शब्द एवम विभिन्न रंग  ब्लॉग टाइटल/ब्लोगर्स को इंगित करते हुए है../*तीसरा खंबा ]

Tuesday, June 30, 2009

Blogging & Litrature

"कोई पत्थर से न मारे मैरे दीवाने को"---इंटर-नेट

[अन्तर्जाल और ब्लोगिन्ग पर लेखकीय ज़िम्मेदारी का ज़िक्र पढ़ कर- दिनेशराय द्विवेदीजी की आज की पोस्ट से प्रेरित होकर]

अन्तर्जाल पर अन्तर्द्वन्द के शिकार लोगो की सन्ख्या का तेज़ी से बढ्ना!अन्तर्जाल की कामयाबी ही तो है।स्वयँ का परिचय करवाने को लालायित लोग अगर ये ज़िद न रखे किउन्हे फ़ौरन ही साहित्य्कार का दर्जा मिल जाये, तो वे अधिक सहज हो जाएंगे,दिल की बात ज़्यादा खुल कर कह पाएंगे।
जब आप 'जाल' मे फ़ंसे हुए ही है, तो लाचारी है कि,कुछ पत्थर भी झेलने पड़ जाए।ये फ़ंसने का चुनाव भी तो आप ही ने किया है,आपथोड़ा धीरज धर जाए।
क़ैद की शर्ते [साहित्य का तक़ाज़ा] तो पूरा करना पड़ेगा,उचित शब्दो का प्रयोग कर, संयमित भी होना पड़ेगा,जब तक कि अंतर्द्वंदों से मुक्त, साहित्य के असीमित आकाश मे,उन्मुक्त होकर, ''उड़न-तश्तरी''* बन निर्बाध गति से उड़ान भर सको……


*समीर लालजी


-मन्सूर अली हाश्मी

Tuesday, September 16, 2008

Blogging-11/Nimantran

ब्लागियात-११  

ब्लोग्स पर  comments देने की बजाय सीधे 'blog' ही के माध्यम से लेखक से सीधे-सीधे वार्तालाप कर लेने का तरीका मैंने इसलिए अपनाया ताकि 'लेख' और लेखक के प्रति उत्पन्न हुई ख़ुद की समझ को विस्तार दे सकूं, यदि कुछ ग़लत समझा हो तो निराकरण भी हो जाए. किसी से "बहुत बढ़िया" का दो शब्दों का comment लेकर ठीक से पता नही चलता की "क्या" बढ़िया?
एक भाई का यह सुझाव भी अच्छा है की प्रति दिन कम-अज-कम १० कमेंट्स देवे .ठीक है, परन्तु कम मगर विस्तृत कमेंट्स पर भी विचार होना चाहिए, कुछ विषयों का यह तकाज़ा होता है.
आज ब्लोगर्स की रूचि, विषयों की विविधता और किसी बात का तत्काल सम्पूर्ण विश्व में पहुँच जाना ....लेखकीय विश्व का बहुत बड़ा इन्किलाब है, जिसने ब्लोगिंग को आकर्षक और लोकप्रिय बना दिया है.
इस विषय पर ब्लोग्गेर्स और वाचको के मत आमंत्रित है, धन्यवाद.
-मंसूर अली हाश्मी

Blogging-10

ब्लागियात-१०

स्वयं के लिये:-      [ पत्नी का प्रहार.........ब्लोगर्स होशियार!]

लिखते-लिखते यह तुम को क्या सूझी,
नुक्ता चीनी पे क्यों उतर आए?
'हाश्मी' तुम शिकारी शब्दों के,
खींचा-तानी पे क्यो उतर आए?


सर को down करो है बंद server,
रोक लो अब कलम मेरे दिलबर,
कितने पन्ने स्याह कर डाले....
अब ज़रूरत है आपकी घर पर.


-जी , मैं {m}ही हूँ  {h} , [किसी से न कहना]

Blogging-9

ब्लागियात-९

आज रक्षंदा की बारी है.........

गर  'बला' थी कोई, खेर से टल गई ,
दीदी रक्षंदा तुम तो सफल ही रही,
''उनके''* जेंडर  का भी कुछ पता न लगा,
वह ब्लॉगर तो हरगिज़ नही था कोई.

-एम्.हाश्मी

*असभ्य टिप्पणी से प्रताड़ित करने वाला

Monday, September 15, 2008

Blogging-8

ब्लागियात-8

दादा द्विवेदीजी* को प्रणाम:-


दो ही वेदों को पढ़ के ये आलम,
दर्दे-इंसानियत से है लबरेज़,
बात इन्साफ ही की करते है,
है कलम आपका बहुत ज़रखेज़*

*उपजाऊ


-मंसूर अली हाश्मी.

*तीसरा खंबा 

Blogging-7

ब्लागियात-७

आज भाई राजेश घोटिकर पर नज़र डाल रहा हूँ :-

#चमन के फूल में चिडियों की चह-च-हाहट में,
  ब्लॉग मिलते है इनको हर एक आहटमें,
  ये 'घोंट कर' के पिलाते सबक है जन-जन को,
  स्वच्छ-ओ-सुंदर पर्यावरण की चाहट में।

# ग्लोबलाइजेशन पे गौर करते है,
 मस्वेदा- नुक्लीअर डील पढ़ते है,
आश्रित देश हो .... पसंद नही,
पहले ख़ुद को सिक्योर करते है।

# पक्षियों पर तो प्यार आता है,
   हाँ , इन्हे बार-बार आता है,
   आदमी पर नज़र करे जो कभी,
   x-ray का ख्याल आता है।

-मंसूर अली हाश्मी
#birdswatchinggroup

Sunday, September 14, 2008

blogging-6

ब्लागियात-६
एक ब्लोगर की *महफ़िल में बिला इजाज़त प्रवेश कर गया [क्षमा-याचना]
ब्लॉग पर टिपयाते हुए ....
''किसीने उजड़ी हुई महफिलों में ढूंढाहै,
है बात 'गुप्त' मगर ,यह भी एक 'सीमा' है,
कसक है ,दर्द है, चाहट जो मिल नही पायी,
नया है कहने का अंदाज़ एक सलीका है।''
अपनी रचना  'साथी'  परोस आया:-
''तू ही तशना-लब है साथी,
मुझे क्या पिलाएगी तू ?
तेरा जाम तो है टूटा,मुझे क्या रिझाएगी तू ?
तू बुझी हुई है ख़ुद भी,मुझे क्या जलाएगी तू?
तेरा साज़ सूना-सूना,तेरा नग़्मा ग़म-रसीदा,
तेरी ज़ुल्फ़ भी परीशाँ,तेरी बज्म वीराँ-वीराँ…यूँ लगे कि जैसे सहरा,
कोई एक पल न ठहरा,
सभी रिन्द जा चुके है, मै ही रह गया अकेला!
तू करीब आ के मैरे,तेरी तशनगी मिटा दूँ,
तू मुझे पिला दे सब ग़म, मै तुझे हयात लादूँ
तुझे आग दूँ जिगर कीतेरे हुस्न को जिला दूँ 
तेरी बज़्म फ़िर सजा
तेरी ज़िन्दगी है मुझसे,
तू ही मेरी ज़िन्दगी है,
मै हूँ दीप तू है बाती, मिले हम तो रौशनी है।''

-मन्सूर अली हाश्मी
*passion से

Blogging-5

ब्लागियात-5

ब्लोगेर्स पर कुछ और तफसील के साथ उनकी ही लेखनी की रोशनी में, क्षमा प्रार्थना के साथ अगर कोई अतिशयोक्ति हो गई हो :


# भले 'समीर' ने kiss में ब्लॉग पाया है,
   enjoy ख़ुद ने किया,औरो को रिझाया है,
   फिर  उसके बाद सबक नीति का पढाया है,
   फलित हुए है, प्रतिसाद* खूब पाया है।        *comments

*समीर लाल जी को में निम्न टिपण्णी देने से स्वयं को नही रोक पाया:-
"kiss का किस्सा बयान कर डाला,
लब को दिल की जुबान कर डाला,
उड़ते-उड़ते कहाँ ये आ बैठे ,
ख़ुद को cupid गुमान कर डाला।

बात जब अच्छी लग रही थी तभी,
आपने क्या विचार कर डाला,
'तड़का' morality का देकर,
मीठे को भी अचार कर डाला।

संस्कारो की बात कर डाली,
पंडितो की ख़बर भी ले डाली,
रास-लीला के प्लेटफारम से,
पटरी ही आपने बदल डाली।

खूब है आपका मिजाज़ ऐ 'लाल'
रह के परदेस में भी देशी चाल,
सत कथन बोलते रहो हरदम,
है दुआ रब से वो करेगा निहाल।

-मानसूर अली हाश्मी.
*udan-tashtari

Saturday, September 13, 2008

Blogging-3

ब्लागियात-3

चलते-फिरते ब्लॉग बनते है,
गिरते-पड़ते ब्लॉग बनते है,
कुछ कहो तो ब्लॉग बनते है,
चुप रहो तो ब्लॉग बनते है।


बन सके तो ब्लॉग लिख डालो,
सारा अच्छा ख़राब लिख डालो,
अपने मन की किताब लिख डालो,
ख़ुद ही अपना हिसाब लिख डालो।


तुम जो चूके तो कोई लिख देगा,
'लेने वाला' तो तुम को क्या देगा,
जो छुपानी है बात कह देगा,
जग हसाई की बात कह देगा।


लिख नही सकते कोई बात नही,
अब दवात-ओ-कलम की बात गई,
दब के अक्षर उभरते है अबतो,
है ज़माना नया है बात नई.

पढ़ना अक्षर भी हमको न आवत,
कोनू स्कूल  को भी न जावत,
छोड़ दो अब मजाक ओ भय्या,
हमसे अच्छा ब्लॉग का पावत?
-मंसूर अली हाश्मी