एक अण्णा हज़ार बीमार
सौ है बीमार एक अनार है आज,
सरे फेहरिस्त भ्रष्टाचार है आज.
छोड़ गुलशन निकल पड़ा आख़िर,
गुल को खारों पे इख्तियार है आज.
मरता, करता न क्यां! दहाढ़ उठा!
हौसला कितना बेशुमार है आज.
हक़ परस्ती की बात करता है !
कोई 'मंसूर' सू -ए- दार है आज?
दरिया बिफरा ज़मीं में कम्पन है,
क्यों फ़िज़ा इतनी बेक़रार है आज.
गिरती क़द्रें है; बढ़ती महंगाई,
मुल्क में कैसा इन्तिशार है आज !
दंगा 'सट्टे' पे, जाँ 'सुपारी' एवज़ !
फिर छपा एक इश्तेहार है आज.
जिस्म बीमार; रूह अफ्सुर्दः
जिस्म बीमार; रूह अफ्सुर्दः
इक मसीहा का इंतज़ार है आज.
'अक्लमंदों' का अब कहाँ फुक्दान* *[कमी]
एक धूँदो मिले हज़ार है आज.
-mansoor ali hashmi


