Sunday, May 13, 2012

'कृपा-कृपा' ही अब दोहराता हूँ मैं !





दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi
 said...
हुस्न सुंदरता के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। सुंदरता यदि शारीरिक हो सकती है तो मानसिक और व्यवहारिक भी हो सकती है। यह लेखकों की ही कमी है कि वे मानसिक और व्यवहारिक सुंदरता के लिए इस शब्द का प्रयोग बिरले ही करते हैं।

'खुमार बाराबंकवी' का यह शेर था ज़ेहन में जब द्विवेदी जी की उपरोक्त टिप्पणी पढ़ी :
"हुस्न जब मेहरबाँ हो तो क्या कीजिए,
इश्क के मगफिरत की दुआ कीजिए."

लेकिन द्विवेदीजी की सलाह पर अमल करते हुए कुछ इस तरह लिख गया, उनसे मा'ज़रत के साथ पेश है:



हुस्न 'प्रयत्न' से क्यूँ  न  हासिल करूं ?
'लवली-लवली' क्रीम लेके आया हूँ मैं. 

'आशीर्वाद' ही लेता रहा अब तलक,
'कृपा-कृपा' ही अब दोहराता हूँ मैं !

'हुस्नो-अख़लाक़'* आदर्श जब से से बने,           [*सद आचरण] 
'धर्म ' अपना इसी को बताता हूँ मैं.

'मानसिक-सौंदर्य' के प्रदर्शन के लिए,
KBC* को एस एम् एस  कर आया हूँ मैं.         * [कौन बनेगा.....]

दोगलेपन के चोले से निकला तभी, 
इक नए 'हाशमीजी' ! को पाया हूँ मैं.


mansoor ali hashmi 

Thursday, May 10, 2012

खुशियों के और उम्मीदों के गाये तराने सब.


रग-रग की खबर !  यानी 'शब्दों का सफ़र' ,  जी हां!  'शब्दों' का ओपरेशन यही होता है.  प्रस्तुत है आज की पोस्ट पर  प्रतिक्रिया:-

'माँ' की हमारी आँखे भी द्रवित है इन दिनों.


'कोलेस्ट्रल' जमा है 'रगों' में , इसी लिए,
रफ़्तार अपने देश की मद्धम सी हो रही,
'आचार' है 'भ्रष्ट' फिर 'संवेदनहीनता',
मदहोश  रहनुमा है तो जनता भी सो रही,

'नलिनी', 'रेनुकाएं'* भी है प्रदूषित इन दिनों,       {*नदी के अन्य नाम }
'प्रवाह', कोलेस्ट्रल से है, प्रभावित इन दिनों.
अपनी रगों में खून की गर्दिश भी कम हुई,
'माँ' की हमारी आँखे भी द्रवित है इन दिनों.

'आवेग' के लिए है ज़रूरत 'ऋ'षी की अब,
संस्कारों से 'सिंचित' हो, ये धरती ए मेरे रब, 
'बाबाओं' से नजात मिले अब तो देश को, 
खुशियों के और उम्मीदों के गाये तराने सब.

 -मंसूर अली हाश्मी 

Wednesday, May 9, 2012

हासिले सफ़र !


आमने सामने


"दस मिनट की मुलाकात के लिये हजार मील की यात्रा करो - एक  शानदार रिश्ता ई-मेल से नहीं बनता।" रॉबिन शर्मा के ब्लॉग से।
[ 'ज्ञानोक्ति' के आज  के विचार से प्रभावित्] 
'फेसबुक' पर जो सूरत दिखी,
Chat फिर रोज़ होने लगी ,
दिल की  बेताबियाँ जब बढ़ी,
फिर तो 'मिलने' ही की ठान ली.

'आमने-सामने' थे मगर, 
सूरते दोनों अनजान सी,
ए.के. हंगल से मजनू मियाँ,
बीबी टुनटुन सी लैला लगी.





चाय पी, खाए बिस्किट मगर,
बात मौसम पे करते रहे,
'केडबरी' साथ लाये थे जो,
साथ अपने ही फिर ले गए !

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-मंसूर अली हाश्मी 
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Sunday, April 22, 2012

आज का भजन


 आज का भजन 

[भजन का 'अर्थ' समझने के लिए ...

‘कुछ’ तो हो सकता है निर्मल नरुला का

एकोऽहम्  

की 'कुंजी' अवश्य खरीदे ! ]

अब और तू 'निर्मल' को 'न'-'रुला',
तुझ पर भी होवेगी 'कृपा', 
जो बीत गया सो बीत गया,
मत शोर मचा, मत शोर मचा.


बीता कल तो था 'हज़ारी' का, 
'बाबा' है ये तो 'करोड़ी' का,
एक बेग 'ब्लेक' ज़रा ले आ,
जितना चाहे उसमे भरजा.


कर चुके 'सरस्वती' की वंदना,
'लक्ष्मी' संग 'उल्लू' पर चढ़ जा.
इस 'दूध' में 'फेन' नहीं है ज़रा,
आजा, मुख पर 'मक्खन' मलजा !

'कागज़' पत्तर तू फाड़ दे सब,
'इन्साफ' में लगती देर बहुत,
अब क्या 'उपमा' दे, कबीर भगत ?
'रूई' भी हुई 'अग्नि-रोधक' !


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Monday, April 16, 2012

खींचो किसी की टांग तो बनती है कविता !


खींचो किसी की टांग तो बनती है कविता !

अजित वडनेरकर जी, कवियों से पंगा लेने 'ब्लेक होल' में जाने की हिम्मत नहीं, 'कविता' ही की कुछ ख़बर इस तरह ली है.....आपकी  'अकविता' [Face Book पर ]
से प्रेरणा पाकर...
शब्दों से छेड़-छाड़ से 'बनती' है कविता,
अर्थो से भी खाली हो तो 'बिकती' है कविता.

बे-दाम ब्लागों पे अब छपती है कविता,
मंचो पे पढ़ी जाए तो 'दिखती' है  कविता.

'काका'* कभी पढ़ते थे तो 'हंसती' थी कविता,            *हाथरसी
जोकर  भी सुनाये है, तो 'रोती'  है कविता,

'हूटिंग' अगर हो जाये , बिलखती है कविता,
बिजली जो हुई गुल तो सिसकती है कविता.

नखराली 'शायरा' कभी पढ़ती है कविता,
गिरती है कविता, कभी पड़ती है कविता.

'बलात' इस का 'कार' भी होते हुए  देखा,
लिक्खे कोई, नाम 'उनके' ही, छपती है कविता.

सब की ही बनी जाती है भाभी, ये 'सविता'
शादी से भी पहले अभी जनती है 'कविता'. 

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mansoor ali hashmi 

Thursday, April 12, 2012

कुछ कर तो रहे है !


कुछ कर तो रहे है !
["बलाए-ताक नहीं, बालाए-ताक सही " "शब्दों का सफ़र" की बालाए - कैसे बनी बलाए !]

'बालाए ताक़' रखके*  'बला' टाल रहे है,             *कोर्ट के निर्णय को 
'अफज़ल' हो कि 'कस्साब' हो हम पाल रहे है.

'बिंदु' जो कभी थे वो हिमालय से लगे अब,
'रेखाओं' के नीचे जो है, पामाल रहे है.

बदली 'परिभाषा , मनोरंजन की तो देखो,
अब 'बार की बालाओं' को वो 'ताक' रहे है !
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बालाई पे बैठे है,कशिश भी है 'बला' की,
हम कूचा-ए-यारां की सड़क नाप रहे है.






गालो पे फ़िदा हो के तो 'बलमा' वो बने थे,
रूख्सार के 'बल'*, 'बालो' से अब ढांप रहे है.        *सिलवट 










होती 'अल-बला' तो वो टल जाती दुआ से,
अब 'हार'* बन गयी है तो बस जाप रहे है!         *माला 


'मेहराब' तलक  अब तो रसाई नही होती,
'तक' कर ही मियाँ हांप रहे, काँप रहे है !



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--mansoor ali hashmi 


Wednesday, April 4, 2012

बदलती परिभाषाएं !


बदलती परिभाषाएं !

पारदर्शिता' का सन्देश हुआ यूं व्यापक,

नग्न होने को ज़रूरत नहीं हम्माम की अब.

'साफगोई' का चलन जब से बढ़ा, ये देखा,
गालियों से भी क़दर बढ़ती है, इंसान की अब.

हुस्न के, जिस्म के, बदले है मआनी कैसे, 
लो उठा शोर,कि शर्ट फटती है, 'सलमान' की अब.








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बदलता ज़माना !

'चारागर' ही को ज़रूरत है, मुआलिज की अभी,
खुद 'मुआलिज' ही भरोसे पे है भगवान के अब. 

अब 'रफूगर' का गिरेबाँ ही मिला चाक हमें,
पैराहन फैंक दिया, 'मजनूं' ने किस शान से अब

'दार्शनिक' ख़ुद को दिखाने पे तुले है अबतो,
थे जो 'प्रसिद्द', वही दिखते है, अनजान से अब.

अब तो 'ईमान' की दाढ़ी में दिखे है तिनके,
और 'चोरो' को निगहबानी के फरमान है अब.

'राहबर' है मुतलाशी, किसी भटके जन का,
'राहज़न', फर्मारवाओं के जो मेहमान है अब.

'ज्ञान-भंडार' सुरक्षित हुए अब 'चिप्सो' में,
'पुस्तकालय', नज़र आते है, वीरान से अब.

'सब्र' ने फाड़ दिया अपना ही दामन अबतो,
'जब्र' के खेमे में होने लगी सुनवाई है अब.

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-- mansoor ali hashmi 

Friday, March 23, 2012

परीक्षा .....चरवाहे की !


परीक्षा .....चरवाहे की !
आज [२३-०३-२०१२] के समाचार पत्रों से प्रेरित.....




# अपनी 'भेड़ो' को हांक लाये है,
'पर्वतो' से ये भाग आये है.
# भेड़े वैसे तो शोर करती नहीं,
फिर भी 'गुपचुप' हंकाल लाये है.
# 'ऊन' है, 'दूध-ओ-गोश्त' है  इनमे,
इस लिए तो ये दिल लुभाए है. 



# 'भेड़े' बनकर न 'घोड़े' बिक जाए,
खौफ़ इनको यही सताए है.
# 'चारागाह' और भी है 'चरवाहे',
मुफ्त का 'चारा' सब को भाये है.
# 'पंजा' बालो को नोच ले न कहीं,
'संघ' के आश्रय में लाये है,
# खौफ़ है बेवफाई का इनसे !
यूं 'महाकाल' याद आये है !!
 --mansoor ali hashmi

Wednesday, March 21, 2012

NEW FORMULA


[भविष्य

by Gyandutt Pandey
"भविष्य जो आप देखते हैं, वह भविष्य आपको मिलता है।"]
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सुन्दर डर्टी पिक्चर 
आई. टी. में है 'भविष्य' ; ये  जानकर ,   
'कर्नाटक' में हमने अपनाया इसे,   
'मोबाईल' से ही चला था काम वां, 
'आई.पोड' अब मिल गया 'गुजरात' में. 
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कम करना है ग़रीबी, तो कम कर ग़रीब को !
थी योजना 'भविष्य' की, ग़ुरबत घटाएंगे,
रेखा 'अमीरी' ही की, अब आगे बढ़ाएंगे,  
इक रात में करोड़ों को इस पार ले लिया,
"इस तरह " भविष्य आपका उज्जवल बनाएंगे!

-Mansoor ali Hashmi

Friday, February 24, 2012

चौपाई[याँ] (यानी चार पैरों वाली कुर्सी)

चौपाई[याँ]  (यानी चार पैरों वाली कुर्सी)



और 'येद्दू' को न अब  तड़पाईए,
खोयी गद्दी फिर उसे दिलवाईये.
आप बिन 'नाटक' अधूरा सा लगे,
आईये, आ जाईये, आ जाईये.


'पोर्टफोलियो' कुछ अभी खाली पड़े,
पाव दर्ज़न मंत्री भी हट चुके !
{देखने के 'जुर्म' से है 'पट' चुके}
'खाने-पीने' से सभी है डर रहे,
आईये, ख़ा जाईये, ख़ा जाईये !

टीम 'आधी' आप ही के  साथ है,
दिख रहा 'पंजे' नुमा इक 'हाथ' है,
'shake' करले 'hand' मत शर्माईये,
भाग्य अपने फिर से अब अज़माईए, 

आप 'Ready' है तो 'रेड्डी' साथ है,
पहल  करना 'राजनैतिक' पाठ है,
जो है सत्ता में उसी के ठाठ है,
आज का 'चाणक्य' बन दिखलाईये !

आईये, आजाईये, आजाईये !
Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. 
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mansoor ali hashmi