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Friday, June 27, 2014

आस हम भी लगाए बैठे है !

आस हम भी लगाए बैठे है !

गालियाँ बदमज़ाक़ देते है 
ख़ुश्मज़ाक़ हाथो-हाथ लेते है। 

चित्र, सुन्दर लगा के* दाद तलब            [ *FB  पर ] 
खूब 'Like' जुटाएं बैठे है। 
'मर्दुए' भी ज़नाना वेषों में 
मजनूओं को रिझाए रहते है।  

'फेंकने' वाले, इत्मीनान से है 
'झेलू' अब तक उसे लपेटे है !

'चाय' की अब दूकान बंद हुई 
खाली कप है; फ़ूटी प्लेटें  है। 





{ग़ज़ल का एक शेर :
हाथ उठा कर जो ली है अंगड़ाई 
कितने दिल उसने यूं समेटे है !}

'पाँव-भाजी'  है 'आम' लोग अब तो
'हाशमी' भी 'चने-बटेटे' है !   

-- मंसूर अली हाशमी 
 
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