Google+ Badge

Wednesday, December 31, 2008

ग़ज़ल-1

ग़ज़ल-1

जुस्तजूं* में उनकी हम जब कभी निकलते है,
साथ-साथ मन्ज़िल और रास्ते भी चल्ते है।


दौर में तरक्की के दिल लगाके अब मजनूँ,
रोज़ एक नई लैला आजकल बदलते है।


ता-हयात मन्ज़िल पर वो पहुंच नही सकते,
मुश्किलों के डर से जो रास्ते बदलते है।


ज़िन्दगी की राहों में हाशमी वह क्यों भटके,
जो जवाँ इरादों को साथ ले के चलते है।

*तलाश
-मन्सूर अली हाशमी।

आशावाद /optimism

नई मंजिल

कुछ खुश्गवार यादों के साये तले चले,
कुछ खुश्गवार वादो के साये तले चले,
कुछ यूँ चले कि चलना मुकद्दर समझ लिया,
आखिर जहाने फ़ानी से से चलते चले गये।


रुक यूँ गये कि दश्त* को गुलशन समझ लिया,
और सामने पहाड़ को चिल्मन# समझ लिया,
सोचा कि अबतो देख के नज़्ज़ारा जाएंगे,
ठहरे हुए को दुनिया ने मदफ़न समझ लिया।


फ़िर चल पड़े तलाश में मन्ज़िल को इक नयी,
लेकर चले उमंग नयी, आरज़ू नयी,
गुज़री हुई बिसारके आगे को चल दिये,
नव-वर्ष आ गया है, सुबह भी नयी-नयी।
*जंगल
#पर्दा
ईश्वरत्व का
कब्र
[नोट:- अन्तिम चार पंक्तियां- श्री द्विवेदीजी और सुश्री वर्षाजी की फ़र्माईश पर जोड़ दी है]
सभी ब्लागर साथियों को नव-वर्ष [2009] की बधाई, शुभ-कामनाओ सहित, जय-हिन्द्।


मन्सूर अली हाशमी।  

Foul Player

अनाड़ी-खिलाड़ी

जंग अब भी जारी है,
जूतम-पैजारी है।


कारगिल से बच निकले,
किस्मत की यारी है।

खेल कर चुके वह तो,
अब हमारी बारी है।

एल,ई,टी ; जे-हा-दी,
किस-किस से यारी है?


मज़हब न ईमाँ है,
केवल संसारी है।


सिक्के सब खोटे है,
कैसे ज़रदारी है?


पूरब तो खो बैठे,
पश्चिम की बारी है!


-मन्सूर अली हशमी

आकलन

आकलन
दौड़-भाग करके हम पहुँच तो गये लेकिन,
रास्ते में गठरी भी छोड़नी पड़ी हमको।

साथ थे बहुत सारे, आस का समन्दर था,
छोड़ बैठे जाने कब, जाने किस घड़ी हमको।

अब है रेत का दरिया, तशनगी का आलम है,
मृग-तृष्णा थी वो , सूझ न पड़ी हमको।

एक सदा सी आती है, जो हमें बुलाती है,
मौत पास में देखी, देखती खड़ी हमको।

अलविदा कहे अबतो, फ़िर कहाँ मिलेंगे अब,
अंत तो भला होगा,चैन है बड़ी हमको।

-मन्सूर अली हाशमी

Tuesday, December 30, 2008

Cursing

Tuesday, 30 December, 2008
मिर्ज़ा ग़ालिब तो "गालिया खाके बे मज़ा न हुआ" वाली तबियत के मालिक थे, अब जो घुघूती जी ने गालियों वाला सोपान खोला है, रोचक बनता जा रहा है. गालियों के उदगम के नए-नए क्षेत्र उजागर हो रहे है. परंपरागत के अतिरिक्त सामंतिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, लिंग-भेदी वगेरह -वगेरह. मैंने भी गालियों के सन्दर्भ में अपने ब्लॉग ''यथार्थवादिता'' में धार्मिक और सामाजिक असहिष्णुता को लेकर चल रहे 'गाली-युद्ध' का ज़िक्र किया था, जो इस तरह था:

[
आप-साहब, श्रीमान, जनाब, महाशय और शिष्टाचारी रूपी सारे वह शब्द हम त्याग दे जिसे बोलते समय हमारा आशय सद नही होता। सदाशयताका विलोप तो जाने कब से हो गया। क्यों न हम यथार्थवादी बन सचमुच जो शब्द हमारी सोच में है, तीखे, भद्दे, गन्दे, गालियों से युक्त, विषयुक्त परंतु कितने आनंद दायक जब हमें उसे प्रयोग करने का कभी सद अवसर प्राप्त होता है।क्यों न हम यह विष वमण कर दे, और इसे तर्क संगत साबित करने के लिये, इतिहास के गर्त मे सोये दुराचारो, अनाचारो, अत्याचारो के गढ़े मुर्दे बेकफ़न कर दे! अच्छा ही होगा, हमें बद हज़मी से भी ज़्यादा कुछ होगया है, हमारा सहनशील पाचक मेदा अलसर ग्रस्त हो गया है! और मुश्किल यह है कि हमें लगातार तीखे मिर्च-मसाले खिलाये जा रहे है-- धर्म के, दीन के, स्वर्निम इतिहास की अस्मिता के नाम पर,जबकि नैतिक पतन के इस दौर में ये शब्द अर्थ-हीन होते जा रहे है। मज़हब की अफ़ीम से , नींद आ भी जाये परन्तु 'अल्सर' तो दुरस्त नही होगा। इस अल्सर को कुरैद कर काट कर उसमें से अपशब्दो को बह लेने दो। इसमें मरने का तो डर है, परन्तु अभी जो स्थिति है उससे बेह्तर है। मैने तो सभ्य बनने की कौशिश में शिष्टाचार का जो आवरण औढ़ रखा है उसमें गालियां भी दुआए बन कर प्रवेश होती है। परन्तु अप शब्दों का मैरे पास भी टोटा नही, छोटपन दिखाने के लिये मेरा कद भी आप से कम छोटा नही। शब्दों के मेरे पास वह बाण है कि धराशायी कर दूंगा तमाम कपोल-कल्पित मान्यताओ को, वीरान इबादत गाहो को,परन्तु नमूने की कुछ ही बानगी परोस कर ही मैं यह दान-पात्र आपके बीच छोड़ना चाह्ता हूँ. इस अवसर को महा अवसर मान कर बल्कि महाभारत जान कर कूद पड़ो]
मेरा यह मानना है की गालियों के उदगम में मूलत: गुस्सा, असहिष्णुता, असंतुष्टि और असहजता ही व्याप्त होती है जिस पर मनुष्य का बस कम होता है. ऐसे में वह गाली वाला अस्त्र सहजता से प्रयुक्त हो जाता है. अगर यह सफल रहा तो सामने वाले को दबा देता है या प्रत्युत्तर में तगड़ा वार् झेलना पड़ता है. अक्सर गाली देने वाला गाली झेलने में कम ही सक्षम होते है.
परम्परानुसार, लिंग-भेद के चलते स्त्री-लिंग ही गालियों की ज़द में अधिकतर आता है, जो हमारे सामाजिक उत्थान के स्तर को दर्शाता है. इसी स्तर की स्थिति ने हमें परेशान किया है की हम ''गाली-पुराण'' पर गंभीरता से चर्चा करनेको उद्वेलित हुए है एक कमेन्ट में 'मीठी'' गाली का भी ज़िक्र आया , अच्छा लगा. यह ''मिठास'' भी मधु-मेह का precaution लेते हुए प्रयोग की जाए तो बेहतर है. यह अस्त्र कम संहारक होता है. एक दान-पात्र ऐसी मीठी गालियों के लिए मैं अपने ब्लोगर साथियो के बीच छोड़ना चाहता हूँ, इसे भर कर नवाजिश फरमाए, इसी बहाने यह बहस और कुछ दूर तक चलने दे.सभी दिखाएँ
-म.हाश्मी .

Monday, December 29, 2008

Technological Nuisance

अक्कल-युग 

डांट [DOT] कर जो काम [COM]करवाओ तो होता आजकल,
मेल [MAIL] से ही तो मिलन लोगो का होता आजकल।


पहले मन से और विचारो से न था जिसका गुज़र,
ढेर सारे "मैल" अबतो मिल रहे है आजकल .


कोई याहू.न की तरफ़ लपका तो कोई ''हॉट'' पर,
गू-गले [goo-gle] से भी उतरता हमने देखा आजकल.


झाड़-फूँको की जगह अब आ गया है ''ORKUT'',
फूंक के बिन आदमी जालो में फसता आजकल.


याहूँ का पहले कभी 'जगंली' मे होता था शुमार,
अब तो हर टेबल के उपर [DESKTOP]मौजूद होता आजकल्।


पहले बालिग़ [व्यस्क] होने को दरकार थे अठारह साल,
नन्हा-मुन्ना भी यहाँ होता ब्लाँगर आजकल्।


मन्सूर अली हाशमी

Saturday, December 27, 2008

चौथा बन्दर

चौथा बन्दर

स्थान:- मकान की छत
समय:- प्रात: 6 बजे
कार्य:- ब्लाँगरी

फ़िर वही सुबह,वही छत,वही ब्लाँगिन्ग्। आज फ़िर बन्दर दर्शन हुए। यक न शुद, दोशुद [एक नही दो-दो]।
हाश्मी: बहुत खुश हो , क्य बात है? बन्दरजी!

बन्दर: बन्दर नही, ज़रदारी कहो, अब मैं भी मालदार[ज़रदार] हो गया हूँ.
हाश्मी: कोई मदारी मिल गया क्या?
बन्दर: नही, मेरे पहले ब्लाग "अथ श्री बन्दर कथा" की बदौलत्।
हाश्मी: वाव! कितने डालर मिले?
बन्दर: डालर! उसका हम क्या करे? हमे कोई जूते थोड़े ही खरीदना है!
हाश्मी: फ़िर क्या मिल गया है?
बन्दर: आम का बग़ीचा, पूरे दस पैड़ है।
हाश्मी: किसने दिया?
बन्दर: एक एन आर आई ने, वह अपने कुत्ते के नाम वसीयत करने वाला था, मगर वह किसी मंत्री पर भौंक बैठा और मारा गया। ऐसे में संयोग्वश उस एन आर आई ने मेरी "अथ श्री कथा"
पढ़ ली, इतना प्रभावित हुवा कि पहली ही तश्तरी में उड़ान भर कर मेरे पास आ पहुंचा।
इस तरह उसका 'चौपाए खाते' वाला दान मेरी झोली में आ गया। मैं , बैठे-बिठाये पंच हज़ारी हो गया। पांच हज़ार आम सालाना का मालिक!
हाश्मी: यह तुम्हारे साथ दूसरा कौन है?
बन्दर: यह मेरे ब्लोग का फ़ोलोअर है। जब से मैं ज़रदारी बना हूँ, मेरा  पीछा ही नही छोड़ रही, बन्दरी है ये, समझे ना?
हाश्मी: अब क्या करोगे?
बन्दर: ब्लाँग से अच्छा क्या काम हो सकता है, वही जारी रखूंगा।
हाश्मी: अभी क्या लिख रहे हो?
बन्दर: लिख तो लिया है, अभी तो इस चिंता में हूँ कि 'ब्लाँग एडरेस' क्या बनाऊँ? 'तीन बन्दर' तो
मनुष्य ने रजिस्टर्ड कर ही रखे है। सौचता हूँ 'चौथा बन्दर' ही नाम दे दूँ?  "बुरा मत लिखो" के सलोगन के साथ्। बाकी तीन सलोगन - बुरा न बोलना, न सुनना व न देखना का ठेका तो
मनुष्य ने उसके प्रतीक बन्दरो को सौंप निश्चिंत हो गया है। यह चौथे बन्दर की प्रेरणा मुझे आप लोगों के चौथे स्तंभ से भी मिल रही है, जो शायद लिखने-लिखाने की बाबत ही है। हालांकि
पहले तीन बन्दर भी अपना संदेश पहुंचाने में असफ़ल प्रतीत हो रहे है, फ़िर भी यह 'चौथा बन्दर'' अति आवश्यक इसलिये हो गया है कि आज कल आप लोग निर्बाध हो कर कुछ भी लिखते चले
जा रहे हो। मुझ में तो गाँधीजी बनने की यौग्यता नही मगर मैं  उस आदर्श-पुरुष को नमण कर अपना 'चौथा बन्दर' लांच कर रहा हूँ, नये वर्ष की पूर्व संधया पर, "बुरा मत लिखो'' के नारे के साथ्। तर्कवादी मनुष्य कोई गली न निकाल ले इसलिये इस नारे को ''बुरा मत छापो" के संदर्भ में भी लिया जाए।
यह बात मुझे अच्छी तरह पता है कि मनुष्य इस चौथे बन्दर को अपने तीन आदर्श बन्दरो के साथ जगह नही देंगे। फ़िर मैं इसको स्थापित कहाँ करुं?  बल्कि क्यों करूँ?,  हम बन्दर आप लोगों की तरह रुढ़िवादी नही है, कहीं टिक कर बैठना, आप लोगों की तरह कुर्सी या सिंहासन पर चिपक जाना हमारी फ़ितरत के खिलाफ़ है।
आपको इस चौथे बन्दर के दर्शन भी आसानी से उपलब्ध हो जाएंगे, आपके तथा कथित निकट वर्तमान के नेताओ की जो मूर्तीयाँ  जगह-जगह पर स्थापित है;  उस पर सवार कोई बन्दर नज़र आये तो समझ लेना वही चोथा बन्दर है, प्रतीकात्मक रूप में यह कहता हुआ कि "बुरा मत लिखो",  नही तो आपकी भी मूर्ती कहीं लग जएगी!
हाश्मी: वाह-वाह! ये तो पूर ब्लाँग ही बन गया!
बन्दर: ब्लाँग नही बन्दरलाँग कहिये।

अचानक बन्दरी उछल कर बन्दर के सिर पर सवार हो गयी.....मैने आश्चर्य से पूछा…ये क्या!
बन्दर: नही समझे?…यही तो चौथा बन्दर है…बोले तो…? "बुरा मत लिखो"…हम चले…बाय!

Thursday, December 11, 2008

Changing Phase

परिवर्तन 

अब ब्लागों पे जंग जारी है,
धर्म वालो में बेकरारी है।


अब निबाह ले हम अपना राज-धरम ,
कौमवादो की बन्टाढारी है.


चीर-हरण हो रहा द्रोपदी का,
देखिये कितनी लम्बी साड़ी है?


मूल्य चढ़ते है ,कद्रें* गिरती है,
अर्थ-नीति पे कौन भारी है?


अपने घर में भी हम नही महफूज़,
जंग किससे ये अब हमारी है।


लोक का तंत्र ही सफल होगा,
गिनते जाओ ये मत-शुमारी है,


आग अब 'ताज'' तक नही पहुंचे ,
आपकी-मेरी जिम्मेदारी है।

 *values
-मंसूर अली हाशमी



Wednesday, December 3, 2008

WEAKNESS

कमज़ोरी
टिप्पणी जोड़ें RSS feed for responses to this blog entry
mansoorali hashmi द्वारा 3 दिसंबर, 2008 10:51:00 AM IST पर पोस्टेड #


उनका आंतक फ़ैलाने का दावा सच्चा था,
शायद मेरे घर का दरवाज़ा ही कच्चा था।


पूत ने पांव पसारे तो वह दानव बन बैठा,
वही पड़ोसी जिसको समझा अपना बच्चा था।


नाग लपैटे आये थे वो अपने जिस्मो पर,
हाथो में हमने देखा फूलो का गुच्छा था।


तौड़ दो सर उसका, इसके पहले कि वह डस ले,
इसके पहले भी हमने खाया ही गच्चा था।


जात-धर्म का रोग यहाँ फ़ैला हैज़ा बनकर,
मानवता का वास था जबतक कितना अच्छा था।
-मंसूर अली हाशमी 

Thursday, October 30, 2008

INSPIRATION







प्रेरणा/पकोड़ा !


डाँ। माथुर को आज क्लिनिक आधा घन्टा देरी से जाना था, सुनीता  का यही आग्रह था। तीन कप चाय और 8-10 पकौड़े बनाने के सम्बंध में जितनी चिन्तित सुनीता दिखी,उससे डाँ माथुर के आश्चर्य में वृद्धि ही हुई। उसे ये बात तो समझ में रही थी कि सुनीता  के साहित्य लेखन का प्रेरक आज पहली बार घर पर रहा था, बल्कि डाँ माथुर ही के आग्रह पर सुनीता ने उसे आज नाश्ते पर निमंत्रण दिया था। आठ बजने में यानि निश्चित समय में अभी पन्द्रह मिनट बाकी थे। घण्टी बजी, सुनीता  सहज ही दरवाज़े की तरफ़ लपकी……दूध वाला था। डाँ माथुर मन में बोले ये तो मेरी प्रेरक वस्तु लाया! दो मिनिट बाद पुन: घन्टी बजी, सुनिता उठते-उठते रह गयी, फ़ोन की घन्टी थी, किसी मरीज़ के फ़ोन की। आठ में पांच कम पर पुण: दरवाज़े की घंटी बजी। डाँक्टर ने अब उठना अपनी ज़िम्मेदारी समझा--सब्ज़ी वाला था, डाँ माथुर उसे क्लिनिक पर मिलने का कहने ही वाले थे कि सुनीता आगे बढ़ कर बोल पड़ी, "आईय-आईये" डाँ माथुर ने आश्चर्य चकित भाव से सुनीता को देखा! नयी वेश-भूषा में सुसज्जित आगन्तुक को सोफ़े पर बैठाते हुए पति से बोली,
"आप है श्री राजेश कुमार्।" नमस्ते का आदान-प्रादान हुआ। "चकित हुए ना", अब सुनीता पति से संबोधित थी। "आठवीं तक राजेश मेरा  सह्पाठी रहा है, मेरा कलम दोबारा कुछ रचता अगर इसने उस निबंध प्रतियोगिता में मेरा होसला बढ़ाया होता, जब क्लास के सारे बच्चे हँस पड़े थे और राजू अकेला ताली बजा रहा था; इतनी ज़ोर से कि सब की हँसी दब गयी।" "किस बात पर?" के जवाब में सुनीता ने बताया कि वह हड़बड़ाहट मेंबंदर-अदरक’ वाला मुहावरा उल्टा बोल गयी थी।
सब्ज़ी की ठेला गाड़ी पर खड़े-खड़े ग्लास से चाय पीने के आदी राजेश को कीमती चाइनीज़ कप-सॉसर थामने के लिये दोनो हाथ व्यस्त रखते हुए चाय पीने का मज़ा कम ही रहा था। उस कीमती वस्तु को संभालने की कौशिश में उसके हाथो की हल्की सी कंपन और उससे उत्पन्न संगीत डाँ माथुर का धयान आकर्षित किये बग़ैर रह सकी। डाँक्टर माथुर को सुनीता की प्रेरणा ने शायद निराश ही किया था। उनकी कल्पना में उच्च स्तर की साहित्य रचने वाली उसकी पत्नी का 'प्रेरक' [या प्रेमी] भी कोई 'शाह्कार' ही होगा मगर यह ठेले पर सब्ज़ी बेचने वाला राजू ?, शाकाहार निकला। किसी भी सूरत उनके गले नही उतर रहा था। चाय का आखरी घूंट गले से उतारते हुए डाँ माथुर ने यह सोचा फ़िर उस तीखी हरी मिर्च का वह टुकड़ा जो पहले इन्होने अपने पकोड़े में से निकाल लिया था, उठा कर चबा लिया! चाय की मिठास प्रेरणा के इस अनुपयुक्त लगे पात्र के प्रसंग से उत्पन्न कड़वाहट को दबाने के लिये?
अब डाँ माथुर पर अन्तर्मन से यह दबाव भी था कि घर आये मेहमान से कुछ बातें भी करे, औपचारिक ही सही, आखिरकार एक सवाल बना ही लिया- "राजेशजी आप को साहित्य में तो रूचि होगी ही? "जी हाँ, मै ब्लाँग लिखता हुँ। ''अरे,  बापरे!'' यह बोलते हुए अपना सिर थामने के लिये डाँ माथुर ने अपने दोनो हाथ उपर तो उठाये मगर सुनीता  से नज़र मिलते ही उसके डर से या सज्जनता वश, अपने उठे हुए हाथो को बाल संवारने के काम में लाते हुए वापस टेबल पर ले आये, धीरेसे। राजेश ख़ामोश ही रहा, उसको शायद डाँ साहब की आश्चर्य मिश्रित टिप्पणी समझ में नही आयी थी। इधर, सुनीता को यह अच्छा लग रहा था कि डाँ माथुर ने स्वयं ही राजेश से बात की शुरुआत की, अब वह निश्चिंत थी कि उसे अधिक बोलना नही पड़ेगा! सुनीता की नज़रों में अपने लिये प्रसंशा देख, डाँ माथुर ने ख़ुद ही बात आगे बढ़ाई, "क्या प्रिय विषय है आपका?"  ''सहकार'' राजेश ने उत्तर दिया, "यही सोचता हूँ, यही लिखता हूँ, यही जीता हूँ।
एक तरफ़ तो डाँ माथुर राजेश की इस दार्शनिक सोच पर चकित थे, दूसरी तरफ़ उनका दिमाग़ शब्दों की दूसरी ही गणित में उलझा हुआ था। वह मन ही मन दुहरा रहे थे---शाहकार- शाकाहार- सह्कार ! वह बोल भी पड़ते, सुनीता के गुस्से का डर होता तो। इस उधेड़-बुन में अगला सवाल यही बन पड़ा कि छपवाते कहाँ हो? "कही नही, ख़ुद के लिये लिखता हूँ, ख़ुद ही पढ़ता हूँ।" , राजेश का विनम्र जवाब था। अब सुनीता पहली बार बोली, "अरे! राजेश, तुमने पहले कभी बताया नही?''
राजेश का जवाब लम्बा हो यह सोचते हुए, उसके उत्तर देने से पहले ही डाँ माथुर ने जैसे आख़री सवाल के तौर पर पूछ लिया, "भाई कुछ सुनाते भी जाओ।
"आपका आग्रह है तो सुनिये:-
ज़िन्दगी गर नाव है तो,
हो सके पतवार बन जा,
शाहकारो की बहुलता,
हो सके 'सह्कार' बन जा।“
'बहुत बढ़िया' का कमेन्ट देते हुए डाँ माथुर पानी के बहाने उठ खड़े हुए, राजेश ने भी आझा चाह ली, सुनीता बचे हुए एक पकोड़े पर हाथ साफ़ कर रही थी।
-मन्सूर अली हाशमी