Thursday, December 31, 2009

रुचिका की फ़रियाद

दुहाई!




'रू' 'ची'त्का'र कर रही अब तक,
'रा' को
पहुंचादो उसके 'ठौर' तलक.
अबतो इन्साफ की दुहाई है,
मसअले कितने ऐसे  गौर तलब  ? 

-मंसूर अली हाशमी 

Saturday, December 5, 2009

केट / CAT

सी ए टी ...केट , केट यानि बिल्ली नही!




फिर बुद्धिजीवियों से इक mistake हो गई,
अबकी, शिकार चूहे से एक CAT हो गई!  

थी NET पर सवार मगर लेट हो गयी,
होना था T-twenty, मगर test हो गई.

zero फिगर पे रीझ के लाये थे पिछले साल,
इक साल भी न गुज़रा, वो अपडेट*  हो गयी.


e-mail  से जुड़े थे, हुए जब वो रु-ब-रु,
देखा बड़े मियां को तो miss जेट* हो गयी.


बिन मोहर के ही वोट से होता चुनाव अब,

pee  बोलती मशीन ही ballet हो गयी.




महबूबा,पत्नी , बाद में बच्चों कि माँ बनी,
कुछ साल और गुज़रे तो सर्वेंट हो गयी.




'सत्रह बरस'* ही निकली जो लिबराह्नी रपट,
पक्ष-ओ-विपक्ष दोनों में रीजेक्ट हो गयी.




लौट आये उलटे पाँव, मियाँ तीस मारखां,
रस्ते से जब पसार* कोई cat हो गयी.




अमरीका ने नकारा तो रशिया पे ख़ैर की,
स्वाईंन फ्लू से उनकी वहां भेंट हो गयी.




टिप्याएं रोज़-रोज़ तो ये फायदा हुआ,
गूगल पे आज उनसे मेरी chat  हो गयी.




*अपडेट =दिन चढ़े,  *जेट=उड़न-छू,  *सत्रह बरस=अवयस्क,
*पसार होना =गुज़रना.


-मंसूर अली हाशमी 

Monday, November 30, 2009

हृदयांजलि: अपना पीडीएफ पुस्तक कैसे प्रकाशित करें

हृदयांजलि: अपना पीडीएफ पुस्तक कैसे प्रकाशित करें: "लिंक

एक लिंक बना"

लिब्राहन आयोग / Liberhan Commission

लिब्राहन आयोग 


एक 'रपट'  फिर लीक हो गयी,
हार किसी की जीत हो गयी.


देर से आई, ख़ैर न लायी,
कैसे भी कम्प्लीट हो गयी.


तोड़-फोड़ तो एक ही दिन की,
'सत्रह साली'  ईंट*  हो गयी.


संसद पर जो भी गुज़री हो,
'अमर-वालिया'  meet  हो गयी.


हो न सका 'कल्याण' जो खुद का,
मंदिर से फिर  प्रीत हो गयी.


बड़े राम से , निकले नेता,
बिगड़ी बाज़ी ठीक हो गयी.

*ईंट= निर्माण के लिए बनायी गयी.

-मंसूर अली हाशमी

Sunday, November 29, 2009

टी. वी. चेनल्स /T V Channels

टी. वी. चेनल्स 

खबरों के  कुछ  चेनल बीमार नज़र आते है,
इनमे से कुछ  लोकल  अखबार  नज़र  आते  है.

बिग बोसों के  छोटे कारोबार  नज़र आते हैं,
छुट-भय्यो को,हर दिन  त्यौहार नज़र आते है.

नोस्त्रोद्र्म के चेले  तो बेज़ार नज़र आते है,
प्रलय ही के  कुछ चेनल प्रचार नज़र आते है.

कुछ चेनल तो जैसे कि सरकार नज़र आते है,
मिनिस्टरों से भरे हुए दरबार नज़र आते है.

घर का चेन भी लुटते देखा है इसकी खातिर,
आतंक ही का ये भी एक प्रसार नज़र आते है.

इतने पास से दूर का दर्शन ये करवाते है,
संजय* जैसे भी कुछ तारणहार नज़र आते है.

भविष्य फल पर टिका हुआ, अस्तित्व यहाँ देखा,
नादानों को दिन में भी स्टार* नज़र आते है.

चीयर्स बालाओं से शोहरत* का घटना-बढ़ना,
खेल-कूद में कैसे दावेदार नज़र आते है!

नूरा कुश्ती, फिक्सिंग के मतवालों की जय-जय, 
झूठ को सच दिखलाने को तैयार नज़र आते है.

'श्रद्धा' से 'आस्थाओं' से हो कर ओत-प्रोत,      
धर्म के रखवाले यहाँ सरशार* नज़र आते है.

*संजय=दूर द्रष्टा[महा भारत के एक पात्र]
*सितारे 
*शोहरत=टी.आर.पी.
*सरशार=मस्त 
-मंसूर अली हाशमी 

Tuesday, November 17, 2009

कटी पतंग /kati patang


कटी पतंग 


[शब्दों का  सफ़र पर अजित वडनेरकरजी कि आज कि पोस्ट मांझे की सुताई
से चकरी व् मांझा उधार ले कर .......]

अभी हाल ही में कटी थी पतंग,
पुराना था मंझा लगी जिस पे ज़ंग,
थी सत्ता कि चाहत बड़ी थी उमंग,
नतीजो ने उनका उड़ाया है रंग.


है अपने  सभी तो नज़र क्यों हो तंग,
ज़ुबानो-इलाकों में क्यों छेड़े जंग,
जो सदियों में जाकर मिली है हमें,
उस आज़ादी में अपनी डाले क्यों भंग.


खिलाड़ी से फिर एक टकरा गए,
सुनी बात उसकी तो चकरा गए,
डराने भी आये वो ''ठकरा''  गए,
बयानों में अपने ही जकड़ा गए.

मंसूर अली हाश्मी 

Sunday, November 15, 2009

अवमूल्यन /devaluation

अवमूल्यन 

जो बे हुनर थे आज वो इज्ज़त म'आब* है,
अच्छे भलो का देखिये ख़ाना खराब है.


ताउम्र भागते रहे जिसकी तलाश में,
पाया ये बिल अखीर* के वो तो सराब* है.


संस्कार और शरीअते सिखलाने वालो के,
हाथो में हमने देखा कि उलटी किताब है.


जीरो पे है फुगावा निरख* आसमान पर,
उलटा है गर ज़माना तो उलटा हिसाब है.


सब्जेक्ट, ऑब्जेक्ट है; फिर कैसा इम्तिहाँ?
हैरान से खड़े ये सवाल-ओ-जवाब है.

*प्रतिष्ठित,  अंत में,  मृग-तृष्णा   ,  दाम[मूल्य]


मंसूर अली हाशमी 

Saturday, November 14, 2009

नया पैमाना /Forbes- Power Measuring Machine!


नया पैमाना 

अप-डेट* होके गुंडे पाए नया मुकाम,
दाऊद पूरबी तो, पश्चिम का है ओसाम[a].
सर्वेयरों* को मिलते अब रोज़ नए काम
बदनाम भी हुए तो होता है बड़ा नाम.


*Forbes' List 

Thursday, November 12, 2009

माय फूट!/ My Foot

माय फूट!

वो नहीं बोलता झूट,
''अमची'' न बोला तो 'हूट'
माय फूट!


'आज़मी' को डाला कूट ,
किसको भली लगी करतूत?
माय फूट.


अस्मिता में डाली फूट,
कैसी मानुस में अब टूट,
माय फ़ुट.


चाहें देश ये जाए टूट,
दल को करना है मजबूत,
माय फूट.


नही पूरा हुआ [कर] नाटक,
केवल बदल गया है रूट,
माय फूट.


वे नहीं बोलते झूट, 
खद्दर का पहने है सूट,
माय फूट!


उसने लिए करोड़ो लूट,
जिसको मिली ज़रा भी छूट,
माय फूट.

-मंसूर अली हाशमी

Sunday, November 8, 2009

चटका/Comments!

चटके का झटका 

वाणी मेरी पढ़के उसने आज एक चटका दिया,
अर्थ उनके शब्दों का में ढूंढ़ता ही रह गया,
वो लिखे कि- इतने सुन्दर,कितने सुन्दर आप है,
इस बुढापे में ये कितनी ज़ोर का झटका दिया.


अब ब्लागों पर लगी तस्वीर का मैं  क्या करू,
छप गई; हटती नहीं मुझसे दुबारा क्या करू,
Mail पर भी तो वो आने लगे है आजकल,
थोड़ा-थोड़ा मुझको भी भाने लगे है क्या करू?


नेट पर छपना भी अब तो छोड़ देना चाहिए,
रिश्ता-ए-कागज़ कलम फिर जोड़ देना चाहिए,
नेट के रिश्तो से डर लगने लगा है आजकल,
टिप-टिपाकर pass है ;अब  'मोड़' देना चाहिए. 


-मंसूर अली हाशमी