Monday, April 16, 2012

खींचो किसी की टांग तो बनती है कविता !


खींचो किसी की टांग तो बनती है कविता !

अजित वडनेरकर जी, कवियों से पंगा लेने 'ब्लेक होल' में जाने की हिम्मत नहीं, 'कविता' ही की कुछ ख़बर इस तरह ली है.....आपकी  'अकविता' [Face Book पर ]
से प्रेरणा पाकर...
शब्दों से छेड़-छाड़ से 'बनती' है कविता,
अर्थो से भी खाली हो तो 'बिकती' है कविता.

बे-दाम ब्लागों पे अब छपती है कविता,
मंचो पे पढ़ी जाए तो 'दिखती' है  कविता.

'काका'* कभी पढ़ते थे तो 'हंसती' थी कविता,            *हाथरसी
जोकर  भी सुनाये है, तो 'रोती'  है कविता,

'हूटिंग' अगर हो जाये , बिलखती है कविता,
बिजली जो हुई गुल तो सिसकती है कविता.

नखराली 'शायरा' कभी पढ़ती है कविता,
गिरती है कविता, कभी पड़ती है कविता.

'बलात' इस का 'कार' भी होते हुए  देखा,
लिक्खे कोई, नाम 'उनके' ही, छपती है कविता.

सब की ही बनी जाती है भाभी, ये 'सविता'
शादी से भी पहले अभी जनती है 'कविता'. 

Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. 
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}

mansoor ali hashmi 

5 comments:

विष्णु बैरागी said...

कविता यदि मानवाकार होती तो आपका नागरिक अभिनन्‍दन कर देती। आपने तो कविता की पीडा को जोरदार ढंग से उजागर किया हाशमीजी।
जय हो आपकी।

दिनेशराय द्विवेदी said...

कविता लिखने का अभ्यास करते करते एक स्थिति आती है जब कवि शब्दों से खेलने लगता है और कविता नृत्य करते हुए रूपाकार होती है। आप के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है इन दिनों।

Sulabh Jaiswal "सुलभ" said...

Perfect chitran !!* (*hinglish hai)

नीरज गोस्वामी said...

गिरतीं है कविता कभी पड़ती है कविता... मंसूर भाई जिंदाबाद... आप कमाल हैं बेमिसाल हैं लाजवाब हैं... गजब लिख दिए हैं कविता...🤣😅🤣

Mansoor ali Hashmi said...

शुक्रिया नीरज जी, आपकी तवज्जोह हासिल कर धन्य हुआ।