Friday, October 1, 2010

अब यह करना है..........

अब यह करना है............
["अयोध्या पर फ़ैसला आने बाद...३०.०९.२०१०]

पढ़ चुके इतिहास अब भूगोल* भी जाचेंगे,
'इक' को कैसे 'तीन' करे, 'इन्साफ' से नापेंगे.

साठ साल तक लड़े है, अब दम थोड़ा ले-ले,
"रहनुमा" से अब तो अपने दूर ही भागेंगे.

धर्म, माल, कुर्सी या शौहरत किसकी चाहत है?
किस-किस की क्या निय्यत थी यह ख़ुद ही आकेंगे.

चाक गरीबां है अपना और हाल भी है बेहाल,
फटे में अब दूजो के यारो हम न झाकेंगे.

तौड़-फौड़, तकरार किया, अब चैन से रहने दो,
निकट हुए मंजिल के अब तो ख़ाक न छानेगे.

*भूगोल= geoagraphy 
mansoorali hashmi

Thursday, September 23, 2010

सेल्फ पोर्ट्रे


सेल्फ पोर्ट्रेट [आखरी 'ट' को न पढ़े अँगरेज़ एसा ही करते है]



यह ब्लॉग विचार शून्यता की उपज यूं है कि इसकी प्रेरणा निम्न टिप्पणी से मिली "विचार शून्य" जी की. ख्याल आया कि एक सचित्र रचना ही लिख दूँ  कि उनकी असमंजसता दूर हो . इस तरह ये "self  portrait " चेहरे  के  विभिन्न अंगो  को  विश्लेषित  करती  हुई  हाज़िर  है . इस तरह मुझे ये  भी मोका मिल गया कि ख़ुद की भी बखिया उधेडू   जबकि मैं आमतौर  पर समाज, देश एवं दुनिया को निशाना बनाता रहता हूँ. 

VICHAAR SHOONYA said...

जनाब मुझे तो बस ये बता दें की ब्लॉग पर लगी दो

तस्वीरों में से आपकी कौनसी वाली शक्ल है आजकल
8 September 2010 11:53 PM 
नोट:- {Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.???}

इक 'लट' में, दाढ़ी की मैरी बड़ी शरारत है,
झूठ पे लहरा जाना फ़ौरन इसकी आदत है. 
सच सुनकर तो गले ये मेरे लग-लग जाती है.
छुपी हुई इसमें भी इक गहरी मुसकाहट है.




जुबां की अब क्या ज़रूर जबकि ब्लॉग बोले है,
दाँत गए जब से ये चाचा मुंह कम खोले है,
टिप-टिप टिपयाते रहते कुछ मन में आस लिए,
दिन भर में दस बार कोई वो 'mail' भी खोले है.

मूंछ तो अब ऎसी कि जैसे ऐनक होंठो की 
उसको तो बस मिली हुई है बैठक होंठो की,
तांव जो आता, तेज़धार तलवार सी लगती थी,
कभी हुआ करती थी ये तो रौनक होंठो की.  

नाक तो अब ऐसी कि ज्यों छींको का है डेरा,
मक्खी न बैठी थी जिस पर पोतो ने छेड़ा,
गंध कचौड़ी की अब इसको न आ पाती है,
उंचा रहते-रहते ख़ुद को कर बैठी टेढा.



आँखों के ऊपर तो मोटा चश्मा चढ़ बैठा
चटक-मटक सब भूल मियाँ जी अपने घर बैठा,
चाट  चुके  अखबार अभी टी.वी की बारी है,  
laptop  भी सुबह-सुबह गोदी पे चढ़ बैठा.

पेशानी पर सलवट है पर व्यंग्य भाव मुखड़ा!
अब तक देश,समाज,जगत का रोते थे दुखड़ा,
देख आईना आज हुए है गहन धीर-गंभीर,
ख़ुद पर क़लम चली तो ,लिख डाला ये 'टुकड़ा'.

--
mansoorali hashmi

श्रृद्धा और सबूरी

श्रृद्धा और सबूरी 

ब्लोगर, ब्लोगर, ब्लोगर्र,
लिख लिया? शिघ्र पोस्ट कर, 
आएगा कोई तो 'जाल'' पर,
सैंकड़ो है तेरे 'चारा'- गर,
हो न मायूस तू एक पल,
सब्र कर, सब्र कर, सब्र कर.

टिप्पणी, टिप्पणी, टिप्पणी,
एक दो, मुझसे लो दो गुनी,
"बहुत बढ़िया", बहुत ले लिया,
उससे होती नहीं सनसनी,
पोस्ट १२ बजे क्या लगी,
शून्य पर है टिकी टिप्पणी!

क्यों विकल, क्यों विकल, क्यों विकल,
'बाबरी' या जनम-स्थल?
कौन होगा यहाँ कल सफल,
सर से ऊंचा हुआ अबतो जल,
कर ले  मंजूर सब एक हल,
हॉस्पिटल, हॉस्पिटल, हॉस्पिटल!!! 


--
mansoorali hashmi
श्रृद्धा और सबूरी 

ब्लोगर, ब्लोगर, ब्लोगर्र,
लिख लिया? शिघ्र पोस्ट कर, 
आएगा कोई तो 'जाल'' पर,
सैंकड़ो है तेरे 'चारा'- गर,
हो न मायूस तू एक पल,
सब्र कर, सब्र कर, सब्र कर.

टिप्पणी, टिप्पणी, टिप्पणी,
एक दो, मुझसे लो दो गुनी,
"बहुत बढ़िया", बहुत ले लिया,
उससे होती नहीं सनसनी,
पोस्ट १२ बजे क्या लगी,
शून्य पर है टिकी टिप्पणी!

क्यों विकल, क्यों विकल, क्यों विकल,
'बाबरी' या जनम-स्थल?
कौन होगा यहाँ कल सफल,
सर से ऊंचा हुआ अबतो जल,
कर ले  मंजूर सब एल हल,
हॉस्पिटल, हॉस्पिटल, हॉस्पिटल!!! 


--
mansoorali hashmi

Friday, September 17, 2010

ठहर जा ! सोच ले, अंजाम इसका क्या होगा?


ठहर जा ! सोच ले, अंजाम इसका क्या होगा?


ग्यान इसका मेरे दोस्त तुझको कब होगा. 
जो तुझसे ज़िन्दा रहे क्या वो तेरा रब होगा?

सन्देश वक़्त से पहले ही तूने आम किया,
फसाद होगा तो वो तेरे ही सबब होगा.


जो फैसला तेरे हक में हुआ तो ठीक मगर,
तेरा अमल तो तेरी  सोच के मुजब होगा.  

तू शक की नींव पे तअमीर कर भी लेगा अगर,
जवाब इसका भी तुझसे कभी  तलब होगा. 



हरएक शय से ज़्यादा वतन अज़ीज़ अगर, 
जो क़र्ज़ जान पे तेरे अदा वो कब होगा. 

-- mansoorali हाश्मी


Monday, September 13, 2010

येब्बात है........!


येब्बात है........!
[आज तक का non-commercial(?)  धार्मिक Sting Operation!!!]

लो 'बाबा' को भा गयी इक 'बेबी' है फिर से,
मतलब नहीं वह आयी 'इधर' से या 'उधर' से.

'काला' 'सफ़ेद' होना गो मुश्किल बहुत मगर, 
'श्रद्धेय' इसे करते है बस बाएं ही 'कर' से.


टेंडर की ज़रूरत नहीं 'ठेकों' के वास्ते,
'श्रद्धा' के 'सुमन' लाईये भक्ति की 'डगर' से.

आतंकियों की ख़ैर नहीं अबतो देश में,
'महाराज' ढूँढ़ लाएंगे 'संजय' की नज़र से.  

निपटाना हो किसी को तो Gun की नही ज़रूर,
हो जाएगा ये काम अब 'काली' के कहर से.


यह Media  भी ख़ूब गज़ब करता है यारों,
'आश्रम' को भी करता है 'हरम' अपने हुनर से.

दर्शक भी भक्त भी सभी लगते ठगे-ठगे,
T.R.P.  चढ़ी तो 'गुरुजन' के असर से.

mansoorali hashmi

Saturday, September 11, 2010

आपको क्या कष्ट है?

आपको क्या कष्ट है?




One in three Indians 'utterly corrupt': Former CVC

                                                  -Times Of India [10-09-10]
हर "तीन" में से "एक" 'सरासर' भ्रष्ट है,
'दो' की मुझे तलाश है, जो कम भ्रष्ट है!

मिल जाए काश 'एक' जो wORTHY<>Trust है.
अब मैरी स्थिति तो सभी पे स्पष्ट है.

होते हो क्यूँ उदास नहीं कोई दुष्ट है,
इतनी सी बात है कि ज़रा पथ भ्रष्ट है.

है ये नया ज़माना नया इसका शिष्ट है,
धोका उसी को दो उसे जो मित्र इष्ट है.

जिसकी बहुमति है उसे कष्ट-कष्ट है,
करते है अल्प मत को सभी तुष्ट-तुष्ट है.

अब खेल राजनीति है, इसका उलट भी सच,
जो इसमें आ गया है वही हष्ट-पुष्ट है.

दल-गत की स्थिति में अलग से लगे मगर,  [MPees]
INCOME की बात आयी, सभी एक-मुश्त है.

मंथन से जिसने पा लिया अमृत ए हाशमी,
दुनिया तो उसने पाली उसीकी बहिश्त* है.  [*जन्नत]


ब्लॉग जगत के सभी साथियों  को ईद की शुभ कामनाएं.
mansoorali hashmi

Wednesday, September 8, 2010

वाह! ब्लॉगर....

वाह! ब्लॉगर....

बिल्लियाँ बन बैठे है कुछ तो ब्लोगेर्स  आजकल,
जब कोई चूहा दिखा करते सफाचट आजकल.

जब कोई 'बच्चा'* दिखा देते गटागट* आज कल ,  
टीपके, टिपियाके कुछ चढ़ते फटाफट आजकल.

पेन को तलवार सी चमका के रक्खे  हर घड़ी,
धर्म ही को धर्म से कैसी अदावत आजकल.

'फैसले ' पर "फ़ैसला" लिखने को कुछ बेताब है,
तीखी होती जा रही उनकी लिखावट आजकल.

शब्दों की  खेती पे चलने कैंचियाँ तैयार है,
अपना-अपना उस्तरा अपनी हजामत आजकल.

धर्म हो या देश या ईमान या कि अस्मिता,
काठ की तलवार से करते हिफाज़त आजकल.
 
कम लिखो, न भी लिखो तो फर्क कुछ पड़ता नहीं,
खाली टिपयाने से भी मिलती है शोहरत आजकल.

'लेखिकाएं' Bold  होती जा रही है इन दिनों,
लेखको में दिख रही अबतो नज़ाक़त आजकल.

अब ब्लागों के 'ब्लाको' से ही घर बनने लगे,  'Blocks'
हार्द्वेअरी 'सोफ्ट' ही बनता सिलावट आजकल.

शब्द बेदम भी हो जिनकी साईटे गर आकर्षक,
वो भी चर्चा में है जो करते सजावट आजकल.     

ईंट इक की, दूसरे से लेके रोढ़ा इन दिनों,
"आत्म-मंथन" छोड़ क्यूँ करते हिमाकत आजकल?

  [*नया ब्लोगर, * candy]
 
-- mansoorali hashmi

Tuesday, September 7, 2010

लेने के देने


To,अली साहब , आपकी हल्दी का रंग कहाँ-कहाँ  और कैसे-कैसे लगा टिप्पणियों से जानकर आश्चर्य मिश्रित उल्लास में यह लिख बैठा हूँ!  आप आज्ञा दे तो पब्लिश करदूं? राजेंद्र  Swarn Kaar जी की टिप्पणी भी  प्रेरणादायक रही.

From, अली साहब:



अली सैयद

 to me
show details 10:25 AM (54 minutes ago)
मंसूर अली साहब ,
आदाब अर्ज़ है ,
जरुर पब्लिश कीजियेगा , मुझे खुशी होगी !
अली
2010/9/5 Mansoorali Hashmi <mansoor1948@gmail.com>

लेने के देने 

ये हल्दी लगा खत मेरा मुंह स्याह कर गया होता ...?


[ख़त की हसरत तो पूरी नहीं हुई, मगर हल्दी रंग ज़रूर लाई......वह इस तरह कि...."उस" मकान के इस तरफ तो अली साहब थे और दूसरी तरफ {तसव्वुर कीजिए} जो होस्टल था उसकी खिड़की में से एक श्री  एस.कार  ने दो मकानों की फेंसिंग के बीच की हलचल को भांप लिया था, और जब अली साहब हल्दी लगा ख़त हाथ में लिए बागीचे में अपने पोधो की नब्ज़ टटोल रहे थे तब वह भ्रमर रूपी एस.कार वह हल्दी लगी चिट्ठी की नब्ज़ टटोल के उड़ चुका था जब तक कि आप पलटते. "पूरे तीन दिन" उसने भी नज़रे गाड़े रखी उसने अपने पड़ोस और उसके पड़ोसी पर  (लिखना-पढ़ना भूलकर) . कोई प्रतिक्रिया न देख कर उसने अपने ज़हन में उस ख़त के मज़मून को चित्रवत याद कर के दोहराया:-





नमस्ते ,
मेरे से आप बात करने से क्यों डरते हैं , मैं अच्छी नहीं हूं क्या , तीन दिन से आप मेरी आँख में हैं , आप भी मेरे विषय में किसी - किसी को कुछ बोलते रहते हैं क्या . इसलिए आप मुझसे बात करने के लिए डरते हैं . यह पत्र मैं बहुत हिम्मत कर के लिख रही हूं  !  मैं आपके लिए बहुत हिम्मत वाली हूं लेकिन किस्मत वाली नहीं ,  आपसे बात करने के लिए मन है एक मिनट आप समय देंगे तो मैं आप को बता दूंगी  कि मैं अच्छी हूं या बुरी !  इस पत्र को पढ़ने के बाद भी अगर आपके पास दो मिनट का वक़्त नहीं तो मैं आपको दुबारा मुंह नहीं दिखाउंगी अगर मुझसे कोई गलती हुई होगी तो मुझे माफ करेंगे ! 

...और Helping Hand आगे बढ़ाने का फ़ैसला  कर और उचित अवसर देख आंगन में किसी की प्रतीक्षारत 'भाभीजी' को नमस्कार कर प्रवेश कर ही लिया.
एस.कार:   "नमस्ते भाभीजी."
पड़ोसन:    "सविता है मैरा नाम, कहिये?"
एस.कार:    "नहीं, कुछ नहीं, पड़ोस में होस्टल में रहता हूँ, आज कोलेज                 की छुट्टी है , सोचा आपसे hello करता चलू"
सविता:       "अच्छा, आईये", उसने लान में  रखी कुर्सी की तरफ इशारा करके कहा.

श्रीमान को तो मन की मुराद मिली, लपक लिए. सविता भी बैठते-बैठते रुक गयी, चाय का पूछने के लिए ठहर गयी, प्रत्युत्तर में एस.कार ने कहा....."आपके घर से तो कोफ़ी की महक उठती रहती है!"

सविता:       "सही कहा, हम लोग तो कोफ़ी ही पीते है, मगर इधर के लोग शायद चाय ज़्यादा पसंद करते है?... तो अब चाय की भी आदत बना ली है."
एस.कार:      "किस-किस को जानती है आप इधर, इस कोलोनी में?"
सविता:       "In fact, किसी को भी नहीं, एक पड़ोसी [पास के मकान  की तरफ इशारा करते हुए] है, वह भी नज़रे चुराए रहते है, हम साऊथ वाले ऐसे कोई अजीब प्राणी तो नहीं!"
एस.कार:       "नहीं-नहीं, एसी बात नहीं, बल्कि आप तो हिंदी हम से भी अच्छी बोल लेती है."

सविता चाय बनाने चली गयी,  अब एस.कार की जिज्ञासा बढ़ गयी थी, उसे घर के अन्दर बुलाने की बजाय, बाहर से ही चाय पिला कर निपटा देने वाला मामला लगा. वह भी साथ-साथ घर में प्रवेश कर गया यह कहते हुए कि "आप तकलीफ नहीं करे, चाय फिर कभी."
सविता पीछे मुड़ कर मुस्कुराई, "तकलीफ तो मैं आपको दूंगी, अच्छा है आज आपकी छुट्टी का दिन है."

एस.कार का दिल बल्लियों उछलने लगा, उससे कुछ बोलते न बना. सविता ने चाय बाहर लान में ला कर ही पिलायी, इस दरमियान कुछ इस तरह की बाते हुई:-
सविता:      "बात दरअस्ल यह है कि, यहाँ ट्रान्सफर से पहले मैरे हाथो एक बड़ा एक्सीडेंट हो गया था, मुआवज़े में काफी बढ़ी रक़म चुकाना पढ़ी, कर्ज़ा भी हो गया है, इसलिए पति देर रात तक काम कर क़र्ज़ चुकाने में जुटे हुए है, मैं यहाँ अनजान हूँ कोई भी छोटे-बड़े काम के लिए अटक जाती हूँ."

"ओह!" ठंडी सांस भरते हुए एस.कार ने कहा, "मैरे लायक कोई काम हो तो ज़रूर बता दिया करे."

सविता:       एसा ही एक छोटा सा काम हफ्ते भर से अटका पड़ा है, पति महोदय को तो फुर्सत ही नहीं मिलती और मकान मालिक भी टाले जा रहा है , आज तुम साथ हो तो दुरस्त कर ही लेते है."

एस.कार:      "क्यों नही- क्यों नही", चाय का कप ख़ाली करते हुए, जोश में साथ हो लिया, घर के पिछवाड़े की तरफ, अजीब सी गंध आ रही थी उस तरफ से. सविता ने नाक ढांपने के के लिए साड़ी पल्लू कुछ ज़्यादा ही ऊंचा उठा लिया था[शायद बेख़याली में], इसलिए एस.कार अपनी नाक की चिंता ही नहीं कर पाया. अब वें सेफ्टी टेंक के पास खड़े थे, जहाँ एक पाईप से बदबूदार पानी रिस रहा था. सविता ने पाइप की तरफ इशारा करते हुए कहा इसी को  Replace करना है. pvc पाईप है वैसे ही जुड़ जाएगा . नया पाईप भी ये रखा हुआ है." अब तक एस.कार के होश ठिकाने आ गए थे, बोला, "बस इतनी सी बात है, मै अभी आया अपने दोस्त को फोन करके वो मेरी राह देख रहा होगा."  सविता ने अपना मोबाईल उसकी तरफ बढ़ा दिया, दूसरे हाथ से वह नाक ढांपे हुए थी.  
बौखलाहट में ११ डिजिट दबाया हुआ मोबाईल जब नहीं जुड़ा तो सविता ने पूछ ही लिया "आपने तो प्रदेश के बाहर फोन लगाया लगता है?"
फोन काट कर सविता को थमाते हुए, जल्दी से पाईप जोड़ कर भागने में ही उसको अपनी भलाई लगी. अब तो वह भी बदबू से बचने के लिए अपनी जेब में रूमाल तलाश रहा था. सविता ने अपना लेडिस रूमाल उसको थमा दिया जो खुश्बू से भरा हुआ था. औज़ार का बॉक्स भी पास ही रखा हुआ था, बचने का कोई बहाना उपलब्ध नहीं था. जैसे तैसे पाईप जोड़ कर , शुक्रिया वसूल किये बगैर भाग ही रहा था कि सविता ने अपने रूमाल की याद दिलायी, सो वह उसे लोटा कर "खाली हाथ" बाहर लौट आया.

फेंसिंग के पास खड़े पड़ोसी सज्जन उसे हडबडाहट में भागते देख कर जाने क्या-क्या अनुमान लगा रहे थे!!!     

सट्टे पे सत्ता [७ शेर का तोहफा]

सट्टे पे सत्ता   [७ शेर का तोहफा]

'पाक ने टॉस जीता, पहले सट्टेबाजी का फैसला'

लंदन. लॉर्ड्स टेस्ट से उठे मैच फिक्सिंग के बवाल के बाद पाकिस्तान क्रिकेट टीम की हर ओर हंसी उड़ाई जा रही है। इसका नजारा रविवार को इंग्लैंड के खिलाफ हुए पहले ट्वेंटी-20 मैच में देखने को मिला।

इंग्लैंड के क्रिकेट प्रशंसकों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर जमकर फब्तियां कसीं। जब मुकाबले के लिए टॉस हो रहा था, एक दर्शक ने द सन अखबार के हवाले से कमेंट किया, पाकिस्तान ने टॉस जीता, पहले सट्टेबाजी का फैसला।
किसी समय अपनी रफ्तार से विश्वभर के बल्लेबाजों को भयभीत करने वाले शोएब अख्तर की हर गलती पर इंग्लैंड क्रिकेट प्रशंसक तालियां बजा रहे थे। जैसे ही अख्तर ने एक कैच टपकाया, आश्चर्यजनक रूप से पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
- दैनिक भास्कर ०६-०९-२०१० 

Fixing के मामले में भी वो "पाक-साफ़" है,                                                                                                                 
जितनी भी हो कमाई करे Half-हाफ है.

मुद्दत से ग़मज़दा थे, तरसते थे दाद को,
अब हर तरफ ख़ुशी है; अजी LAUGH-लाफ है.

टोटा रनों का पड़ गया, मुश्किल नहीं है दोस्त,
अपने तो इक्तेसाद* का  चढ़ता ग्राफ है.  [economy]

अब फाख्ता उडाएंगे बन्ने मियाँ , हुज़ूर,
'गिल्ली'* उड़ाना शान के अपनी खिलाफ है.  [*बेल्स]

दब जाएगा ये 'शौर' ज़रा सब्र कीजिए,
'तफ्तीश' वाले साथ में लाये 'लिहाफ'* है. [चादर]

बेकार दौड़-भाग* से हासिल नहीं है कुछ,  [*रन]
'पीटा' नही किसी को तो चलिए "मुआफ" है. 

No-Ball  से भी रुख़ यहाँ पलटे है खेल का,
परवाह न कर वो ON है या कि OFF  है.
فکسنگ کے معاملے میں بھی وہ  "پاک-صاف" ہے
جتنی بھی ہو کمائی کرے HALF - ھاف ہے .

مدّت سے   غم زدہ تھے ترستے تھے داد کو 
اب ہر طرف خوشی ہے، اجی LAUGH-لاف ہے.

توتا رنوں کا پڑ گیا، مشکل نہیں ہے دوست
اپنے تو اکتساد کا چڑھتا  GRAPH ہے.

اب فاختہ اڑا ینگے بننے میاں حضور
گِللی* اڑانا شان کے اپنے خلاف ہے.   ]BELLS]

دب جاےگا یہ شور ذرا صبر کیجئے 
تفتیش والے ساتھ میں لائیں لحاف ہے.

بیکار دور- بھاگ سے حاصل نہی ہے کچھ
   "پیٹا" نہی کسی کو تو چلے معاف ہے.

NO-BALL سے بھی رخ یہاں پلٹے ہے کھیل کا 
پرواہ نہی وہ ON  ہے یا کے OFF  ہے.