Tuesday, August 27, 2013

डबल सिक्स [66 ]





डबल सिक्स [66 ]



मैं डॉलर के बराबर था , 'डबल छक्का'* बना डाला ,         *$ 1 = Rs. 66 

कभी चांदी का सिक्का था, मुझे 'कोयला' बना डाला। 

हमीं ने आदमी को संत, फिर 'भगवन' बना डाला ,
उसी ने 'संस्कारों' को ही मिटटी में मिला डाला  . 

दिखेगा आज* 'मंगल' भी फलक पर 'चाँद' के हमराह ,     *२७ अगस्त'१३ 
'चकोरो' ने सरे ही शाम से डेरा यहाँ डाला। 

मिली जो 'वोट' की ताक़त, उसी का सौदा कर डाला ,
कभी 'धर्मो' की खातिर तो कभी 'ज़र' में बदल डाला। 

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--Mansoor ali Hashmi

Saturday, August 24, 2013

बलात्Car


बलात्कार 



'कर्ता' जो कुछ न करता हो 'बेकार' ही तो है !
इंजन बिना भी चल रही 'सरकार ही तो है. 



धारण किये है मौन और 'ऊर्जा' है क्षीण-क्षीण,
'सरदार'  जो है अपने 'अ'सरदार ही तो  है. 

शामिल रज़ा* न हो तो 'बलात्कार' ही तो है,              *permission 
हठधर्मिता की श्रेणी; व्याभिचार ही तो है। 

प्रशस्त कर रहे है वो 'मुक्ति' का मार्ग ही !
"बाबा"* जो कर रहे है वो सहकार ही तो है!!              * आज के 'बापू'

'रूपये' के दम पे करते थे व्यापार कल तलक 
'रूपये' का घटना आजकल व्यापार ही तो है. 

फिर 'धर्म' का जुनून अब सर पर सवार है,
दंगाईयों की राह फिर हमवार ही तो है. 

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--mansoor ali hashmi 

Friday, August 23, 2013

"हवा"








'अजित वडनेरकर जी ने आज 'हवा' से अठखेली  की है फेसबुक पर , कुछ इस तरह :

" हमारे आसपास जो कुछ है सब हवा ही तो है "

[ कृपया इस विचार को छान्दोग्योपनिषद के चतुर्थ अध्याय या हजारी प्रसाद द्विवेदी के अथ रैक्व आख्यान (अनामदास का पोथा) से न जोड़ा जाए। ये नितांत मेरी अपनी अनुभूति है। हाँ, रैक्व की तरह मैं कनफुजिया साबित हो सकता हूँ। तब की तब देखी जाएगी। ...और यह भी कि मैं पीठ नहीं खुजा रहा  A.W.]

 तो चलिए आज हवा ही को बांधते  है:

"बुलबुल के कारोबार पे है खन्द हाए गुल,
कहते है जिसको इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का !"

चचा ग़ालिब के इस शेर की तरह आपका आपका  मिसरा या फ़िक़रा 
" हमारे आसपास जो कुछ है सब हवा ही तो है "  भी रहस्यमयी लगा  . इस 'हवा'  को टटोलना बड़ा मुश्किल लग रहा है !  फिर भी कुछ यूं कौशिश की है :-

"हवा"

जो कुछ है आस-पास हवा ही हवा तो है ,
'रूहों' का इसमें वास है; हमने सुना तो है.

इसमें 'हवस', तमस, है तो खुश्बूए गुल भी है,
सौ मर्ज़ की जनक भी, मुकम्मिल दवा तो है. 

करती है 'साएँ-साएँ जब माहौल तंग हो,
हो साथ दिलरुबा ! ये बड़ी ख़ुशनुमा तो है. 

तूफाँ पे हो सवार तो ज़ेरो-ज़बर करे, 
और मौसमे बहार की दिलक़श फिज़ा तो है.  

'मुवाफ़िक़'* न हो 'हवा' तो ठिकाने बदलते लोग,     *suitable
तंग हो गयी ज़मीन ?  अभी आसमाँ तो है. 

जलवे 'हवा-हवाई' के देखे हज़ार बार,
मिलवाए मुझको यार से बादे सबा तो है.   

तुम भी ये कह रहे हो कि सब कुछ हवा तो है   
लो, हम भी मान लेते है ; सब कुछ हवा तो है !

इज़हार 'हाशमी' ने मोहब्बत का यूं किया !
मरता है तुम पे कौन? तुम्हे भी पता तो है !!

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Mansoor ali Hashmi      

Monday, August 19, 2013

कब खेल रुकेगा गन्दा !


आत्म-मंथन की २५० वीं पोस्ट पर 'टुंडा' आ बैठा है, ख़ुदा ख़ैर करे !





कब खेल रुकेगा गन्दा !

अब हाथ लगा है 'टुंडा',
बरसो-बरस तक ढूँढा. 

भर गया है इसका हंडा ,
फूटेगा पाप का भंडा.  

जब लगेगा इसको डंडा,
होवेगा जोश भी ठंडा.

'नापाक' समझ कर फेंका*,                *'पाक' ने  
हो गया जो बूढ़ा 'मुण्डा'.  
'दाऊद' से छोटा  गुंडा,
तैयार करो फिर फंदा. 

डॉलर सर पर चढ़ बैठा,
व्यापार हुआ है मंदा.

मौसम 'चुनाव' का आया,
फिर करो इकट्ठा चन्दा.   

अब अगले साल में देखो,
फहराता कौन है झंडा ! 

रक्षा-बंधन के पावन पर्व की हार्दिक बधाई। 
--mansoor ali hashmi 

Saturday, August 17, 2013

हमने तो ये देखा है !


[सभी ब्लॉगर साथियों एवं देश वासियों को रक्षाबंधन के पवित्र पर्व की हार्दिक बधाई]
हमने तो ये देखा है !

गड़बड़ का अंदेशा है,
रुत का ये संदेशा है. 

बिकने* को तैय्यार है ये,                        *[ Horse Trading]
राजनीत इक पेशा है. 

'रूप' इसका क'या' खोटा है?
'गिरता' क्यों हमेशा है !   









'बुक' जब 'फेस' हुवा है तो 
क्यों ये ज़ुल्फ़ परेशा है !

'बंधन' जो है 'रक्षा' का,
एक सूत का रेशा है. 







 

'जूए शीर'* ये लाएगा,                     *[दूध की नहर]  
कोहकनी* ये तेशा* है.

*कोहकनी = फरहाद का , 
* तेशा = बढ़ई का औज़ार    

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--mansoor ali hashmi 

Friday, August 16, 2013

जो 'मीठा' तो गप-गप, है 'थूं-थूं जो 'खट्टा !


जो 'मीठा' तो गप-गप, है 'थूं-थूं जो 'खट्टा !   

ये 'मोदी' ने फेंका* है 'पंजे' पे छक्का,          *PM  के भाषण पर 
कोई कहता कच्चा, कोई कहता पक्का . 

है 'वाचाल' कोई तो 'खामोश' बच्चा !
है 'उद्दंडता' कि जमा खूँ का 'थक्का' ?

बने आज का दिन* पुनर्जन्म जैसा,         *[स्वतंत्रता-दिवस वर्षगाँठ]
सलामत रहे , या ख़ुदा, ज़च्चा-बच्चा.  

न 'शिक्षा' न 'संस्कार' की है ज़रूरत,
वही जीतता है, जो है हट्टा-कट्टा !

'खनन' पर, 'ज़मीं' पर तो 'दंगो' को लेकर,
'सदन' में तो जारी है बस लट्ठम-लट्ठा !

'फुद्बिल', एफडीआई, 'नारी आरक्षण',
अभी पक  रहे है, न रह जाये कच्चा !  

लदे तो है 'बेलो'* पे अंगूर ढेरों ,           *[आगामी चुनाव रूपी]
मिले तो है मीठे, न पाए तो खट्टा . 

ये है लोक-तंतर, बुरा न लगाना, 
जो कहदे तुम्हे कोई 'उल्लू' का पट्ठा !   

--mansoor ali hashmi

Wednesday, August 14, 2013

नज़र आ रहा हर कोई हक़्क़ा-बक़्क़ा !


[सभी बलागर साथियो , भारतवासियों को ६७ वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई।]
नज़र आ रहा हर कोई हक़्क़ा-बक़्क़ा !  

'वो-डरा'*  हुआ तो नहीं लगा,                *[रोबर्ट]
बड़ा 'नेता' उसका कोई 'सगा' !

ये ज़मीनी सौदों के मामले, 
मेरा मुल्क इससे रहा ठगा. 

जो 'कलश'* लिए था निकल पड़ा,     *चेन्नई एक्सप्रेस 
ले के १०० करोड़ भी न रुका !
**
जो 'शतक' की और है बढ़ रहा,
वो 'प्याज़' हमको गया रुला. 

जो कि'डूबना' ही तो था 'मदार'*           *[काम/function,पर आधारित]
इसे* कौन काम लगा गया ???              *[INS सिन्धु पनडुब्बी को]

है 'चुनोती'* बोल के देखिये,                 *[मोदी की]
फतह* कौन करता यहाँ किला .               *[स्वतंत्रता दिवस के भाषण में]

--mansoor ali hashmi 

Friday, August 9, 2013

पॉलिसी में अपनी तो ग़ज़ब की ही लचक है !


पॉलिसी में अपनी तो ग़ज़ब की ही लचक है !

सड़को पे है गड्डे या कि गड्डों में सड़क है,
ठेकों के सभी काम तो होते बे धड़क है. 

पैमाना-ए-रिश्वत यहाँ तय होता सड़क से,
होगा नमक आटे में कि आटे में नमक है !    

डालर ने बिगाड़ी है दशा रूपये की जबसे,
गुज़री है 'चवन्नी', मंद सिक्को की खनक है. 




बर आयी 'मुरादे' तो 'रज़ा' की दरे 'शिव'* पर,                *[शिवराज सिंह चौहान] 
'Modi'fication, उनका भी हो, जो अब भी कड़क है. 

'दुश्मन' हो कि 'आतंकी', सुरक्षित नहीं Border,
अपनों ही के हाथो हुई इज्ज़त की हतक है.  

--mansoor ali hashmi 

Wednesday, July 10, 2013

Party with a Difference !











Party with a Difference !

करते थे बजट पेश अब खुद पेश हुए  है,
मंत्री थे कभी आज वो दरवेश हुए है,
अनैसर्गिक कुकृत्यों के अंजाम में यारों 
दूषित कईं ' मध्य के प्रदेश' * हुए है !     

 *शरीर के वस्ति इलाक़े 

mansoor ali hashmi 

Saturday, July 6, 2013

कैसा यह "घाव" लगा ?





कैसा यह "घाव" लगा ?

'अस्सी' के पार जाके ये अभ्यास किया है,

'नारी' के बिन भी 'काम' का प्रयास किया है,
नारी की अस्मिता की 'हिफाज़त' ही की खातिर,
'हेट्रिक' से ठीक पहले ही 'संन्यास' लिया है. 

'जोरू' तो साथ दे रही; 'ज़र'* तो चला गया !          *[वित्त मंत्रालय]
हाए ! ये अंतिम उम्र में कैसा गज़ब हुआ !!  

-- mansoor ali hashmi