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Monday, September 26, 2011

Blogging at any cost !


लिखना ज़रूरी है !




लिखो कुछ भी; वो पढ़ने आयेंगे ही,
भले दो शब्द ; पर टिप्याएंगे ही.

समझ में उनके आये या न आये,
प्रशंसा करके वो  भर्माएंगे ही. 

जो दे गाली, तो समझो प्यार में है!
कभी इस तरह भी तड़पाएंगे ही.

न जाओ उनकी 'साईट' पर कभी तो,
बिला वजह भी वो घबराएंगे ही.

कभी 'यूँही' जो लिखदी बात कोई ! 
तो धोकर हाथ पीछे पड़जाएंगे ही.

बहुत गहराई है इस 'झील' में तो,
जो उतरे वो तो न 'तर' पाएंगे ही. 

ये बे-मतलब सा क्या तुम हांकते हो!
न समझे है न हम समझाएंगे ही !!

लगा है उनको कुछ एसा ही चस्का,  
कहो कुछ भी वो सुनने आयेंगे ही.


Note: {Picture have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}
--mansoor ali hashmi 

Thursday, September 23, 2010

सेल्फ पोर्ट्रे


सेल्फ पोर्ट्रेट [आखरी 'ट' को न पढ़े अँगरेज़ एसा ही करते है]



यह ब्लॉग विचार शून्यता की उपज यूं है कि इसकी प्रेरणा निम्न टिप्पणी से मिली "विचार शून्य" जी की. ख्याल आया कि एक सचित्र रचना ही लिख दूँ  कि उनकी असमंजसता दूर हो . इस तरह ये "self  portrait " चेहरे  के  विभिन्न अंगो  को  विश्लेषित  करती  हुई  हाज़िर  है . इस तरह मुझे ये  भी मोका मिल गया कि ख़ुद की भी बखिया उधेडू   जबकि मैं आमतौर  पर समाज, देश एवं दुनिया को निशाना बनाता रहता हूँ. 

VICHAAR SHOONYA said...

जनाब मुझे तो बस ये बता दें की ब्लॉग पर लगी दो

तस्वीरों में से आपकी कौनसी वाली शक्ल है आजकल
8 September 2010 11:53 PM 
नोट:- {Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.???}

इक 'लट' में, दाढ़ी की मैरी बड़ी शरारत है,
झूठ पे लहरा जाना फ़ौरन इसकी आदत है. 
सच सुनकर तो गले ये मेरे लग-लग जाती है.
छुपी हुई इसमें भी इक गहरी मुसकाहट है.




जुबां की अब क्या ज़रूर जबकि ब्लॉग बोले है,
दाँत गए जब से ये चाचा मुंह कम खोले है,
टिप-टिप टिपयाते रहते कुछ मन में आस लिए,
दिन भर में दस बार कोई वो 'mail' भी खोले है.

मूंछ तो अब ऎसी कि जैसे ऐनक होंठो की 
उसको तो बस मिली हुई है बैठक होंठो की,
तांव जो आता, तेज़धार तलवार सी लगती थी,
कभी हुआ करती थी ये तो रौनक होंठो की.  

नाक तो अब ऐसी कि ज्यों छींको का है डेरा,
मक्खी न बैठी थी जिस पर पोतो ने छेड़ा,
गंध कचौड़ी की अब इसको न आ पाती है,
उंचा रहते-रहते ख़ुद को कर बैठी टेढा.



आँखों के ऊपर तो मोटा चश्मा चढ़ बैठा
चटक-मटक सब भूल मियाँ जी अपने घर बैठा,
चाट  चुके  अखबार अभी टी.वी की बारी है,  
laptop  भी सुबह-सुबह गोदी पे चढ़ बैठा.

पेशानी पर सलवट है पर व्यंग्य भाव मुखड़ा!
अब तक देश,समाज,जगत का रोते थे दुखड़ा,
देख आईना आज हुए है गहन धीर-गंभीर,
ख़ुद पर क़लम चली तो ,लिख डाला ये 'टुकड़ा'.

--
mansoorali hashmi