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Tuesday, November 17, 2009

कटी पतंग /kati patang


कटी पतंग 


[शब्दों का  सफ़र पर अजित वडनेरकरजी कि आज कि पोस्ट मांझे की सुताई
से चकरी व् मांझा उधार ले कर .......]

अभी हाल ही में कटी थी पतंग,
पुराना था मंझा लगी जिस पे ज़ंग,
थी सत्ता कि चाहत बड़ी थी उमंग,
नतीजो ने उनका उड़ाया है रंग.


है अपने  सभी तो नज़र क्यों हो तंग,
ज़ुबानो-इलाकों में क्यों छेड़े जंग,
जो सदियों में जाकर मिली है हमें,
उस आज़ादी में अपनी डाले क्यों भंग.


खिलाड़ी से फिर एक टकरा गए,
सुनी बात उसकी तो चकरा गए,
डराने भी आये वो ''ठकरा''  गए,
बयानों में अपने ही जकड़ा गए.

मंसूर अली हाश्मी 

Monday, August 31, 2009

छुट्टी हो गई!

छुट्टी हो गयी

चमकाने* जो देश चली थी अन्ध्यारे में कैसे खो गई ?
चाँद हथेली पर दिखलाया, सत्ता भी वादा सी हो गई।

''नाथ'' न पाये सत्ता को फिर, 'वसुन'' धरा पर क्यों कर उतरे,
प्यादों ने भी करी चढ़ाई , इन्द्रप्रस्थ* की सेना सो गई।

''जस'' को यश दिलवाने वाली, थिंक-टेंक अपनी ही तो थी,
''जिन्नों'' से बाधित हो बैठी अपनों ही के हाथो रो गई।

बैठक लम्बी खूब टली तो, चिंतन को भी लंबा कर गयी,
मोहन* की बंसी बाजी तो , सबकी सिट्टी-पिट्टी खो गई।

प्रतीक्षा अब छोड़ दो प्यारे, गाड़ी कब की छूट चुकी है,
आशाओं के मेघ चढ़े थे , एक सुनामी सब को धो गई,

साठ पार जो हो बैठे है, चलो चार धामों को चलदे,
घंटी भी बज चुकी है अबतो, चल दो घर को छुट्टी हो गई.

*Shining इंडिया, *राजधानी, *bhaagvat

-मंसूर अली हाश्मी

Friday, April 10, 2009

OFTEn /अक्सर

अक्सर
में अक्सर कामरेडो से मिला हूँ ,
में अक्सर नॉन -रेडो से मिला हूँ. [जिन्हें अपने ism [विचार -धारा से सरोकार नही रहा]

केसरिया को बना डाला है भगवा,
में अक्सर रंग-रेजो से मिला हूँ. [रंग-भेद/धर्म-भेद करने वाले]

मिला हूँ खादी पहने खद्दरो से,
में अक्सर डर-फरोशो से मिला हूँ. [ अल्प-संख्यकों को बहु-संख्यकों से भयाक्रांत रखने वाले]

मिला हूँ पहलवां से, लल्लुओं से,
में अक्सर खुद-फरेबो से मिला हूँ. [दिग्-भर्मित]

मिला हूँ साहबो से बाबूओ से,
में अक्सर अंग-रेजो से मिला हूँ.

न मिल पाया तो सच्चे भारती से,
वगरना हर किसी से में मिला हूँ.

*
अक्सर*= यानी बहुधा , सारे के सारे नही ! यह व्याख्या भी कानून-विदो के संगत की सीख से एहतियातन
अग्रिम ज़मानत के तौर पर कर दी है - वरना , ब्लागर डरता है क्या किसी से?
-मंसूर अली हाशमी