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Monday, July 14, 2014

बात अच्छे दिनों की क्यों न करे ?



बात अच्छे दिनों की क्यों न करे ?
दिलरुबा, कमसिनों की क्यों न करे !

'जादू'* उसका तो चल नहीं पाया              *[महंगाई पर] 
बात 'दीपक', 'जिनों' की क्यों न करे ?

वो है 'उम्मीद' से कि आएंगे 
सब्र हम कुछ 'दिनों' का क्यों न करे?

'उसका' सीना बड़ा 'कुशादा'* है                     *[चौड़ा] 
बात फिर 'रॉबिनो' सी क्यों न करे ? 
 
'कुफ्र'* की आँधियाँ है ज़ोरों पर             *[नास्तिकता] 
बात फिर मुअमिनों की क्यों न करे ? 

अब भी 'सीता' ही शक के घेरे में 
ज़िक्र फिर 'धोबिनों' का क्यों न करे ?
--मंसूर अली हाश्मी