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Thursday, May 1, 2014

गुदगुदी


गुदगुदी - गुदगुदी - गुदगुदी!

'राय'  उनको भी अब मिल गयी
बाँटते रहते थे जो कभी.
पोलें खोळी थी जिसने  बहुत
'पोल' उसकी भी लो अब खुली.

फूल * कांटा बने न कहीं              (*कमल का)
ऊंगलीयाँ * खुद की दुशमन बनी.      (*मोदी की)

'बाबा'  - "हनी"  पे अब "मौन"  है!
'योग'  'संयोग' मे है ठनी.

है दिवस आज मज़दूर का
छुट्टी  पहचान इसकी बनी!

'रागे पण्डित' पे खामौश शैर*       (*कशमीर के)
खुद पे आयी तो चुप्पी लगी!

'राखी- प्रियंका -  उमा' भी है,
इनपे भी कुछ लिखो 'हाशमी'.

-मंसूर अली हाशमी