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Thursday, October 4, 2012

ग़ैरतमंद !


ग़ैरतमंद  !


मेने कहा करते हो क्या ?
उसने कहा ''हलक़तगिरी''

करदो शुरू गांधीगिरी,
"मिलता नहीं ''सर्किट कोई !"

करते हो 'मत' का 'दान' भी ?
उसने कहा "फुर्सत नहीं"

करदो शुरू तुम भी 'खनन'
"उसमे भी अब बरकत नहीं"

बेशर्म हो!, कूदो, मरो!!
"ऊंचा कोई पर्वत  नही!"

क्रिकेट में है फायदा !
"चारो तरफ CCTV !"

मंगल पे जाना चाहोगे  ?
"गद्दों की याँ पर क्या कमी !"

लड़ते इलेक्शन क्यों नहीं?
"बोगस कहाँ वोटिंग रही?"

चौराहे पर हो क्यों डटे?
"मिलती नहीं पतली गली"

सब कुछ ख़तम क्या हो गया ?
"बस शेष है ब्लागिरी*           *Blogging  ब्लागिरी  
करता हूँ वो ही रात-दिन,
देते कमेन्ट है 'हाशमी' "


-मन्सूर अली हाशमी 

Tuesday, July 31, 2012

ऐसा बोलेंगा तो !

ऐसा बोलेंगा  तो !

'कांसो'* पे भी संतोष जो करले; हमी तो है,           *[कांस्य पदक]
'सोने' से अपने 'ख़्वाब'  को भरले; हमी तो है.

'मनरेगा'  से भी पेट जो भर ले हमी तो है,    [म. गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना] 
भेंसो के चारे को भी जो चर ले हमी तो है.

रिश्वत से काम लेने की आदत सी पड़ गयी,
कागज़ की  नाव पर भी जो तर ले हमी तो है.

"पेशाब कर रहा है गधा इक खड़ा हुआ",
दीवारों पे लिखा  हुआ पढ़ ले हमी तो है !

'बोफोर्स' हो , 'खनन' कि वो 2G ही क्यों न  हो,
'आदर्श' हरइक घपले को कर ले  हमी तो है.

--mansoor ali hashmi 

Monday, January 5, 2009

ग़ज़ल-३

ग़ज़ल-3

चाँद शरमाए अगर देखे तेरी तनवीर* को,
आईना क्या मुंह बताएगा तेरी तसवीर को।



पे-ब-पे* अज़्मो-अमल नाकाम होते ही रहे,
मेने इस पर भी न छोड़ा दामने तदबीर# को।


रंज में, ग़म में, अलम में*  मुझको हँसता देखकर,
बारहा# रोना पड़ा है गर्दिशे तक्दीर को।



वो ही देते है मेरे शेअरो की कीमत हाशमी,
जानते है जो मेरी तेहरीर को तकरीर को।


*चमक, रौशनी
*लगातार
#कौशिश
*दुखो की कष्टप्रद स्थिति
#अक्सर

म् हाशमी।

Sunday, January 4, 2009

Ghazal-2

ग़ज़ल-2

रात रोती रही,सुबह गाती रही,
ज़िन्दगी मुख्तलिफ़ रंग पाती रही।


शब की तारीकियों में मेरें हाल पर,
आरज़ू की किरण मुस्कुराती रही।


सारी दुनिया को मैने भुलाया मगर,
इक तेरी याद थी जो कि आती रही।


मैं खिज़ा में घिरा देखता ही रहा,
और फ़सले बहार आ के जाती रही।

हाशमी मुश्किलों से जो घबरा गया,
हर खुशी उससे दामन बचाती रही।


म्। हाशमी

Wednesday, December 31, 2008

ग़ज़ल-1

ग़ज़ल-1

जुस्तजूं* में उनकी हम जब कभी निकलते है,
साथ-साथ मन्ज़िल और रास्ते भी चल्ते है।


दौर में तरक्की के दिल लगाके अब मजनूँ,
रोज़ एक नई लैला आजकल बदलते है।


ता-हयात मन्ज़िल पर वो पहुंच नही सकते,
मुश्किलों के डर से जो रास्ते बदलते है।


ज़िन्दगी की राहों में हाशमी वह क्यों भटके,
जो जवाँ इरादों को साथ ले के चलते है।

*तलाश
-मन्सूर अली हाशमी।