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Sunday, October 27, 2013

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

संस्कारों की ये विरासत है,
ये मेरा देश है, ये भारत है. 

पैकरे हुस्न है कि आफत है ?
क्या बुलंद उसका क़द्दो-क़ामत है!

मैं, कि शौरीदा सर, गिरफ्ते बला 
उसकी आँखों में बस शरारत है. 

काम शैतान ही के करता है,
फिर भी शैतान ही पे लानत है !

जब भी पढता है, बे-क़रार करे,
है वो 'इन्दौरी' नाम 'राहत' है. 

लफ्ज़ के जोड़-तौड़ में माहिर,
'हाशमी' ही की ये रिवायत है. 

--mansoor ali hashmi 

Tuesday, March 19, 2013

ग़ज़ल


          ग़ज़ल 

http://subeerin.blogspot.com/

[सुबीर संवाद सेवा पर  : "ये क़ैदे बामशक़्क़त जो तूने की अता है"   

तरही मिसरे  पर प्रकाशित ग़ज़ल ...........पुनर्प्रस्तुति ]

हरदम कचोटती जो वो  अंतरात्मा है
काजल की कोठरी में जलता हुआ दिया है

"ये क़ैदे बामशक़्क़त जो तूने की अता है"      
कर भी दे माफ अब तो ये मेरी इल्तिजा है

दरया में है सुनामी , धरती पे ज़लज़ला है
ए गर्दिशे ज़माना दामन में तेरे क्या है?

यारब मिरे वतन को आबादों शाद रखना
दिल में भी और लब पर मेरे यही दुआ है

फैशन, हवस परस्ती, अख्लाक़े बद , ये मस्ती
जब जब भटक गए हम तब तब मिली सजा है

जम्हूरियत है फिर भी 'राजा' तलाशते है !
अपनी सहूलियत से कानून बन रहा है

क्या बात ! पाप अपने धुलते नही हमारे ,
गंगा नहा लिए है, ज़मज़म भी पी लिया है

मज़हब कहाँ सिखाता आपस में बैर रखना ?
है वो भी तो अधर्मी दिल जो दुखा रहा है

'चार लाईना' :    [ Puzzle/पज़ल !] 

"जुल्फों के पेंचो ख़म में दिल ये उलझ गया है
दीवाना मुझको करती तेरी हर एक अदा है 
पाबंदियाँ है आयद रंगे तगज्ज़ुली पर 
कैसे बयाँ करूँ मैं , तू क्या नही है क्या है।"

-- mansoor ali hashmi 

Thursday, August 28, 2008

अक्कल दाढ़/WISDOM TEETH

अक्कल दाढ़

अब जो 'अक्कल की दाढ़'* आयी है,
यह blue tooth मेरे भाई है।


हो के दांतो पे यह सवार मैरे, 
virus अपने साथ लायी है।


दांत तो मुझको फ़ल खिलाते है,
यह तो मुझको ही काट खायी है।


गुप्त file की तरह खुल बैठी
michel Angelo ताई है?


Dentist कह्ते है delete करो,
यह तो अपनी नही पराई है।


मैरी संसद मे जब से आ बैठी,
'मत' अविशवास ही का लायी है।


'हाशमी' सोचते हो क्यों इतना?
यह किसी और की लुगाई है।


तर्क करदो तलाक दे डालो,
तीन लफ़्ज़ो* की तो दुहाई है।


मन्सूर अली हाशमी
*wisdom teeth
*तलाक,तलाक,तलाक

Tuesday, August 5, 2008

Blogging /Aatm-manthan

ब्लॉगिंग के क्षेत्र में इस पहली रचना 'आत्ममंथन' से क़दम रखा है।  अपने विचारों अनुभवों को अपने पाठकों साथी ब्लॉगरो से शेअर करने के लिये। ब्लॉग का टाइटल भी "आत्ममंथन" ही रखा है। पता नहीं यह सिलसिला कब तक जारी रख पाउँगा। प्रस्तुत है पहली ग़ज़ल :-

आत्ममंथन 

"उधार का ख़्याल"* है?    *Borrowed thought
नगद तेरा हिसाब कर्।

भले हो बात बे-तुकी,
छपा दे तू ब्लाग पर्।

समझ न पाए गर कोई,
सवाल कर,जवाब भर्।

न तर्क कर वितर्क कर,
जो लिख दिया किताब कर्।

न मिल सके क्मेन्टस तो,
तू खुद से दस्तयाब* कर्।           *उपलब्ध

तू छप के क्युं छुपा रहे,
न 'हाशमी' हिजाब* कर्।            *पर्दा


-मन्सूरअली हाशमी