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Friday, November 21, 2014

अभी सर पे हमारे आसमाँ है

अभी सर पे हमारे आसमाँ है 

फ़िकर में दोस्त तू क्यों मुब्तला है 
कि अपना घर कोई थोड़े जला है  !

खड़ा है तो कोई बैठा हुआ है 
वो हरकत में है जो लेटा हुआ है. 

अनार इक बीच में रक्खा हुआ है
मरीज़ो में तो झगड़ा हो रहा है। 

लुटा के 'घोड़ा' 'बाबा' सो रहे है,                *[बाबा भारती]
'खडग सिंह' क्यों खड़ा यां रो रहा है ?  

तलब काहे को अब है 'काले धन' की ?
ज़मीर अपना 'स्याह' तो हो रहा है !

कईं 'रामो' को हम 'पाले' हुए है             *[असंत रामपाल]
सिया का राम क्या गुम हो गया है?

बदलते 'मूल्य' का है ये ज़माना 
वही अच्छा है जो सबसे बुरा है। 

हरा था, लाल था, भगवा अभी तक 
कलर 'खाकी' भी अब तो चढ़ गया है।

वो आएंगे, अभी आते ही होंगे 
ओ अच्छे दिन कहाँ है तू कहाँ है ? 

-- शेख मंसूर अली हाश्मी  

Sunday, June 29, 2014

राजनीति में सभी खपने लगे !

राजनीति में सभी खपने लगे !

भक्त को भगवन बना जपने लगे 
खुद है भगवन जाप फिर रटने लगे 

'संस्कार' अंतिम ही उसको जानिये  
'अच्छी' बातें 'गंदी' जब लगने लगे  

कर्ण-प्रिय वाणी थी और अमृत वचन   
अब तो हर-हर शब्द में हगने लगे 

संत में आसक्तियां जगने लगी 
आस्थाओं के दिये बुझने लगे  

मांगे बिन ही जब मुरादें मिल गयी !
'साँई'  उनको ग़ैर अब लगने लगे 

'शून्य' से निर्मित हुई है कायनात 
खोज फिर उस 'शून्य' की करने लगे !

 --मंसूर अली हाश्मी   

Tuesday, June 5, 2012

चर्चा के वास्ते अभी 'पर्यावरण' तो है !

चर्चा के वास्ते अभी 'पर्यावरण' तो है !
[अजित वडनेरकरजी की आज की पोस्ट "कुलीनों का पर्यावरण" से प्रभावित]
इज्ज़त बची हुई कि कोई 'आवरण' तो है,
'प्रदूषित' वर्ना अपने सभी आचरण तो है.

"चर्चा" कुलीन अब नहीं करते ग़रीब की,
स्तर बुलंद जिसका वो ''पर्यावरण'' तो है.

सुनते है आजकल ये बहुत ही ख़राब है,
'माहौल' जिसका नाम वो 'वातावरण' तो है.


  
मरते नहीं कि शर्म ही अब मर चुकी जनाब,
'अनशन' का उनके नाम मगर 'आमरण' तो है.

'बाबा' किसी के हाथ में आते नहीं मगर,
हाथों के अपनी पहुँच में उनके 'चरण' तो है.

'बाबी' भी अब तो मिल गयी है, 'राधे' नाम की,
'बाबाओं' से निराश ! तो कोई शरण तो है.

बदले है अर्थ, प्रथा तो जारी है आज भी,
'रस्मो' के साथ ही सही, 'चीर-हरण' तो है.


[हुस्नो जमाल उम्र की जब नज्र* हो गए, *[भेंट]
शौखी भरी अदा है, अभी बांकपन तो है.]


--mansoor ali hashmi [from Kuwait]

Monday, February 28, 2011

....कि मैं बेज़ार बैठा हूँ!



कुलदीप गुप्ताजी  की रचना ...."कविता की समाधि"    http://kuldipgupta.blogspot.com/  से प्रेरित....

[तुम वह जो टीला देख रहे हो
वह कविता की समाधि है।
कविता जो कभी वेदनाओं का मूर्त रुप हुआ करती थी
उपभोक्तावाद की संवेदनहीनता ने
उसकी हत्या कर दी है।]

.....कि मैं बेज़ार बैठा हूँ!

कविता की  समाधि का जिसे टीला कहा तुमने,
उसी टीले की  इक जानिब पे मैं भी आ के बैठा हूँ,
मुझे तो ये 'समाधी' एक 'कलमाडी' सी लगती है,
 कईं घोटाले इसमें दफ्न, मैं बेज़ार बैठा हूँ.

कई 'आदर्शी टॉवर' तो, 'बड़े स्पेक्ट्रम' इसमें,
छिपे बैठे कई 'अफज़ल-असीमानंद' है इसमें,
कई 'राजा' की गद्दी है, कई 'बाबा' के आसन है,
किसी 'lady' का मोबाईल किसी मुन्नी  का  गायन है.

उछलता sex है और sense मे आई गिरावट है,
न तुम संवेदना धूँदो, बनावट ही बनावट है,
इरादों मे बुलंदी है न जज़बो मे हरारत है,     
न सच्चा है कोई मजनूं  न लैला मे शराफत है.

विवाह भी एक प्रोफेशन ही बनता जा रहा है अब,
लगा क्या है? मिला कितना? ये सोचा जा रहा है अब,
'उपजती' नारी है या नर ये जांचा जा रहा है अब,
पसंदीदा नहीं गर शै  तो बेचा जा रहा है अब.

कवि हूँ  मैं न शायर हूँ, मुफ़त छपता ब्लॉगर हूँ,
न रचना से मैरी संगीतो- सूरत ही उभरती है,
जो गिर्दो -पेश मे दिखता वही लिख मारता हूँ मैं,
संवेदनहीन टीला बनके मैं ख़ुद पे ही बैठा हूँ.
   
mansoorali hashmi

Friday, January 14, 2011

यह कैसा शहर है....!

यह कैसा शहर है....!


["शब्दों  का  सफ़र "  के  आज  के .... .   फ़रमान सुनें या प्रमाण मानें  से प्रेरित,,,]


'नापा' है चाँद जबसे, मअयारे हुस्न बदला,  
पैमाना-ए-नज़र अब माशूक की कमर है.















'प्रमाणम'* काम आते अब [जनम] पत्रियो के बदले, 
ज्योतिष की क्या ज़रूरत 'भौतिक' पे अब नज़र है.

'फरमान' है- कि गिर न पाए ग्राफ अपना,
महंगाई बढ़ रही है, ये भी तो ख़ुश ख़बर है. 

आतंक लाल-हरा था, भगवा भी बन रहा है,
'फरमा' रहे है हाकिम, हमको तो सब ख़बर है. 

पी.ए.सी., जे.पी.सी. भी लाएगी क्या नतीजा,
सारे सबूत जबकि होते इधर-उधर है.


 [*नापतौल/ आकर-प्रकार ]


Note: {Picture have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}
-मंसूर अली हाश्मी 


# मकर सक्रान्ती की हार्दिक बधाई,  सभी ब्लागर एवम पाठक साथियों को.

Monday, August 30, 2010

अब........ / NOW..

अब........

'पर-दर्शन' को एब समझते थे पहले,
'प्रदर्शन' ही रोज़ का अब मामूल हुआ.

'तलवारे' तो  पहुँच गयी है म्यूजियम* में, [*अंग्रेजो की]
अब धर्मो का रक्षक याँ त्रिशूल हुआ.
 
धरम, दया की यारी अब तो टूट रही,
हिंसा से वह लड़ने में मशगूल हुआ.

रिश्वत से अब कम ही उलझन होती है,
ली, दे दी! जब सबब कोई माकूल  हुआ. 

--mansoorali hashmi

Thursday, August 19, 2010

इस रंग बदलती दुनिया में......

इस रंग बदलती दुनिया  में......

नक़ाबो में कईं चेरे छिपे है,
नज़र है जैसी वैसा ही दिखे है.

कोई 'लाली' से 'आतंकित' किसी को,
'हरा' सब 'सांप' के जैसा लगे है.

जो 'तप' और 'त्याग' का प्रतीक था अब,
वही 'भगवा' क्यों 'संसारी' लगे है.

'सफेदी' थी 'मुक़द्दस'* की ज़मानत,  [*पवित्रता की]
कईं 'धब्बे' अब इस पर भी लगे है.

'गुलाबी' में मोहब्बत की कशिश थी,
क्यों 'कांटो' सी 'निगाहों' को चुभे है?

कभी 'नीला' समंदर दिलरुबा था,
लबालब 'ज़हर'* का दरिया लगे है.   [polluted हो कर]


फ़िज़ा की खुशगवारी क्या हसीं थी,
धुआँ हर सिम्त ये कैसा उठे है?
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चार लाईने हिंदी की आज की साहित्यिक संस्कृति पर:-
तराने, राग थे, किलकारियां थी,
हवस है आग है चिंगारियां है !
ये कैसी "छीना-झपटी" कि उड़ी है,
हमारी अस्मिता की धज्जियां है !!

-मंसूर अली हाशमी 

Sunday, November 15, 2009

अवमूल्यन /devaluation

अवमूल्यन 

जो बे हुनर थे आज वो इज्ज़त म'आब* है,
अच्छे भलो का देखिये ख़ाना खराब है.


ताउम्र भागते रहे जिसकी तलाश में,
पाया ये बिल अखीर* के वो तो सराब* है.


संस्कार और शरीअते सिखलाने वालो के,
हाथो में हमने देखा कि उलटी किताब है.


जीरो पे है फुगावा निरख* आसमान पर,
उलटा है गर ज़माना तो उलटा हिसाब है.


सब्जेक्ट, ऑब्जेक्ट है; फिर कैसा इम्तिहाँ?
हैरान से खड़े ये सवाल-ओ-जवाब है.

*प्रतिष्ठित,  अंत में,  मृग-तृष्णा   ,  दाम[मूल्य]


मंसूर अली हाशमी 

Saturday, November 14, 2009

नया पैमाना /Forbes- Power Measuring Machine!


नया पैमाना 

अप-डेट* होके गुंडे पाए नया मुकाम,
दाऊद पूरबी तो, पश्चिम का है ओसाम[a].
सर्वेयरों* को मिलते अब रोज़ नए काम
बदनाम भी हुए तो होता है बड़ा नाम.


*Forbes' List 

Friday, February 6, 2009

New Age

नया ज़माना 

पालतू कुत्ते का काटा माफ़ है,
इस तरह का आजकल इन्साफ है.


कसमे,वादे, झूठ, धोखा, बे-रुख़ी ,
लीडरी के सारे ये औसाफ* है.


है बहुत अंधेर की गर्दी यहाँ,
आजकल बिजली यहाँ पर आँफ है।


इसलिए हालात काबू में नही,
कम कमाई में अधिक इसराफ़* है.


धर्म के हीरो अमल में है सिफर,
बौने क़द भी लग रहे जिराफ है.


जिनकी सूरत और सीरत नेक है,
आईने की तरह वो शफ़्फ़ाफ़ है।


#ज़र्फ़ की इतनी कमी पहले न थी,
बर्फ से भी तुल रही अस्नाफ* है.




[#अन्तिम शेर निम्न शेर से प्रेरित है:-
'यही मअयारे* तिजारत है तो कल का ताजिर
बर्फ़ के बाँट लिये धूप में बैठा होगा।'
*स्तर 


*औसाफ़= विशिष्टताएं, इसराफ़=फ़िज़ुल-ख़र्ची, अस्नाफ़=वस्तुएं
-मंसूर अली हाशमी      

Saturday, October 11, 2008

Upside Down

झूठा सच
 
False ceiling लगाना ज़रूरी है अब,
फ़र्श के साथ छत भी सजा लीजिये,
अब जो उल्टे चलन का ज़माना है यह,
पांव छत पर भी रख कर चला कीजिये ।


पहले ज़ीनत का दर्जा बुलन्दी पे था,
अब तो दर्जा -ब-दर्जा वो पस्ती पे है,
टोपी-पगडी हो सर पर ज़रूरी नही,
शूज़ पर अपने पालिश लगा लीजिये।

लेफ़्ट ही तो है राइट मैरे देश मे,
गाडी जिस सिम्ट चाहें घुमा लीजिये,
है लचक भी तो कानून मे इस कदर,
गाडी फ़ुटपाथ पर भी चढ़ा दीजिये।


ज़र्फ़ की है कमी,तर्क चलते नही,
हर किसी से न यारो वफ़ा कीजिये,
धर्म को भी दया से नही वास्ता,
हो सके तो बुरे से भला कीजिये।


मन्सूर अली हशमी