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Saturday, December 21, 2013

पा के मंज़िल क्यों भटकने लगे लोग !


पा के मंज़िल क्यों भटकने लगे लोग !

बारी आयी तो जिझकने लगे लोग 
अस्प* की तरह बिदकने लगे लोग       *घोड़ा 

जीत से पहले बहुत थिरके थे !
जीत के बाद बिखरने लगे लोग 

'टोपी' गांधी से भी 'अन्ना' से भी ली
बात से उनकी पलटने लगे लोग 

'दिल्ली' पर लपके थे बिल्ली की तरह 
बनके मूषक क्यों दुबकने लगे लोग ?

'मत' का फिर 'दान' न मिल पाया तो ? 
आप-ही-आप बदलने लगे लोग।  

Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture. 
-- mansoor ali hashmi