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Tuesday, February 25, 2014

गालो पे अपने ख़ुद ही तमांचा जड़े हुए !







गालो पे अपने ख़ुद ही तमांचा जड़े हुए ! 

स्तम्भ* वसूलयाबी के दफ्तर बने हुए !    *[प्रजातंत्र के चारों स्तम्भ]
महसूस कर रहे है हम, खुद को ठगे हुए। 

होना था शर्मसार जिन्हे अपनी भूल पर,
उनके ही दिख रहे है अब सीने तने* हुए।   *[कम नहीं, ५६ इंची ]

अब 'आम आदमी' की सनद भी तो छिन* गयी,  *[राजनैतिक पार्टी छीन गई] 
पहचान खो के मूक अब दर्शक बने हुए। 

ढलते है समाचार अब चैनल की मिलो में,
सच्चाई की ज़ुबान पर ताले लगे हुए। 

धुंधला रही है अम्नो-सुलह की इबारते,
धर्म-ओ-अक़ल की आँखों पे जाले पड़े हुए। 
Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.  
--mansoor ali hashmi