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Friday, August 9, 2013

पॉलिसी में अपनी तो ग़ज़ब की ही लचक है !


पॉलिसी में अपनी तो ग़ज़ब की ही लचक है !

सड़को पे है गड्डे या कि गड्डों में सड़क है,
ठेकों के सभी काम तो होते बे धड़क है. 

पैमाना-ए-रिश्वत यहाँ तय होता सड़क से,
होगा नमक आटे में कि आटे में नमक है !    

डालर ने बिगाड़ी है दशा रूपये की जबसे,
गुज़री है 'चवन्नी', मंद सिक्को की खनक है. 




बर आयी 'मुरादे' तो 'रज़ा' की दरे 'शिव'* पर,                *[शिवराज सिंह चौहान] 
'Modi'fication, उनका भी हो, जो अब भी कड़क है. 

'दुश्मन' हो कि 'आतंकी', सुरक्षित नहीं Border,
अपनों ही के हाथो हुई इज्ज़त की हतक है.  

--mansoor ali hashmi