Thursday 24 November 2011

ऐसा भी होता है !


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हुस्न को तेरे क्या कहूं , अपनी नज़र को क्या करूं ? [Click  to go there]


[अली साहब के उपरोक्त आध्यात्मिकता से परिपूर्ण लेख पढ़ते हुए कलयुगी प्रेमियों का जो विचार आया तो ये ख़ाका खीच गया है, प्रस्तुत है अली साहब से क्षमा याचना के साथ.]

पाप की गठरी 

# उसने कहा [अपने पेट पर हाथ रखते हुए]  , "ध्यान से देखो , इसमें जो है वह तुम्हारा है, सिर्फ तुम्हारा."
# मैंने कहा, " मैरा ! मैं तो स्वयं भी ख़ुद का नही हूँ ."
# उसने कहा,  "मैं तो नाचीज़ हूँ, यह जो मिल रहा है वह सत्य है, अद्भुत है, कीमती है, तुम ही इसे साधना."
# मैंने कहा, "मुझसे तो तुम ही न सध सकी."
# उसने कहा, "नहीं तुम मुझे नहीं छोड़ सकते, बल्कि मैं तुम्हे नहीं छोडूंगी , यह जो अब घट चुका है, छुपने वाला नहीं है, अब मैं वापस भी नहीं लौट सकती."
# मैंने कहा, तुम्हारा यह गले पड़ने का प्रयास निरर्थक जायेगा, तुम्हे तो मैंने छुआ तक नहीं." 
# उसने कहा, "तुम भटक रहे हो, यह जो कुछ है, हमें ही मिलना था, हमारे आध्यात्मिक मिलन का प्रतिसाद है यह."
# मैंने कहा, "मुझे छला जाना पसंद नहीं, सच बताओ किसका है?"
# उसने कहा, "तुम समझ नहीं रहे हो , मैं जब तुम्हारी हूँ तो यह भी तुम्हारा ही हुआ ना? , तुम्हारा गंतव्य भी तो यही था ना,फिर विचलित क्यों हो?
# मैंने कहा, "ले जाओ यह पाप की गठरी, और कहीं कुआँ - बावड़ी  करलो."
#  वह ज़मीन  पर बैठ  गयी  और बोली "अब तुम शांत होकर अपनी आँखे बंद करलो."
# मैंने गुस्से से कहा, "आँखे तो अब तक बंद थी मैरी, अब खुल गयी है."
# उसने अपने पेट पर बंधी पाप की गठरी खोली, कीमती आभूषण से भरी थी; और बोली , "ठीक है मैं तो यह सोच कर घर से भाग  आई कि तुम्हारा प्यार सच्चा है, अब  जाओ और अपनी मनहूस सूरत फिर न दिखाना."
# मैं : "अरे, मैरा मतलब यह है कि मुझे एसी दौलत की कोई लालच नहीं, ख़ैर अब तुम  ले ही आई हो तो...."
# उसने कहा, "नहीं, मैं ले नहीं आई, ले जा रही हूँ, तुमसे भी अधिक मैरा चाहने वाला एक और है', और वह चल दी !

    शिक्षा : इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि विश्वास करने के लिए देखना ही नहीं छूना भी आवश्यक है !
Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. 
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}

mansoor ali hashmi 

14 टिप्पणियाँ:

  1. मंसूर अली साहब ,
    गज़ब...हंसते हंसते बुरा हाल है ! अब ध्यान तो क्या सधेगा हंसी साध लूं तो फिर इस आध्यात्मिकता पे कमेन्ट करूं :)

    हिम्मत करके लौट के आता हूं :)

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  2. हाशमीजी! मुझे अपने मदरसे का तालिब बना लीजिए। जनम सुधर भी जाएगा और सफल भी हो जाएगा। दो दिन की यात्रा की थकान आपकी इस पोस्‍ट ने एक पल में दूर कर दी।

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  3. मंसूर अली साहब ,
    ये अपने आपमें एक मुकम्मल रचना है इसे मेरे आलेख के हवाले की दरकार ही नहीं है ! दोनों आलेखों को जोड़ कर पढूं हंसी संभालना मुहाल है और अगर इसे अलग से पढूं तो बेशक बेजोड तंज़ है ! आप गद्य लिखें या पद्य आपका कोई जोड़ नहीं !

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  4. वाह...क्या बात घुमाई है...आखिर में बिना मुस्कुराए रहा नहीं गया...
    नीरज

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  5. बेहतरीन तंज है, लाजवाब!

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  6. Murtaza vakil said :
    Bahut khub aapki rachna husn ko tere kya kahu. maza aaya pad kar aakhir ka sanwad bahut achha hai.. Murtaza Vakil.

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  8. विश्वास करने के लिये क्या देखें और क्या छुयें?

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  9. आदरणीय पण्डे जी,
    # 'आत्म-मंथन' पर आपका आगमन मेरे लिए एक उपलब्धि समान है.
    # गहन-गंभीर चिंतन वाला 'मानसिक हलचल' जो कि धर्म, आध्यात्मिकता, संस्कृति और साहित्य का रस लिए होता है वही 'आत्म-मंथन' हलकी-फुलकी मज़ाहिया और व्यंगात्मक अभिव्यक्तियों का एक प्लेटफोर्म मात्र है.
    # कभी-कभी तो 'ज्ञानोक्ति' के गंभीर कथनों पर भी स्तरहीन टिप्पणियाँ चस्पा कर गया हूँ, मगर आपने दर-गुज़र किया है तो मुझे प्रोत्साहन ही मिला है !

    आपने बड़ा मुश्किल प्रश्न पूछ डाला है !

    "विश्वास करने के लिये क्या देखें और क्या छुयें" ?

    # अगर कहानी के परिप्रेक्ष्य में कहूँ तो देखने से जो चीज़ भ्रमित कर रही थी, उसी को छूने की बात होगी, कृपया उसे विस्तार देके और ऊपर-नीचे जाने के लिए मजबूर न करे!
    # 'छुअन' भी अगर भ्रमात्मक हो तो 'व्यापक दृष्टिपात' की अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता !!
    M.H.

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  10. शिक्षा मिल गई..:)

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  11. क्या बात है जो हसरतें जाती नहीं :)

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  12. वाह! ज़बरदस्त लिखा है...

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