Google+ Badge

Monday, June 27, 2011

Hodge-Podge


अब करे तो क्या?

लगता नहीं है जी मैरा अबतो ब्लॉग में,
शब्दों में वायरस है , छुपे अर्थ fog में.

होने लगा शुमार अब लिखना भी रोग में,
किस्मत अब आजमाए चलो अपनी योग में. 

हम ढूँढते नहीं इसे अपनों या ग़ैर में,
अब तो सिमट गयी है वफाए भी Dog में.

पहले तलाशे मोक्ष का साधन ही त्याग था,
अब खोजा जा रहा है उसे सिर्फ भोग में.

था सच का बोल बाला तो झूठे थे शर्मसार,
शर्मो हया बची है अब गिनती के लोग में 

mansoor ali hashmi 

Saturday, June 25, 2011

Illusion !


उसको मैं कैसा समझता था, वो कैसा निकला !

जितना बाहर था वो उतना ही अन्दर निकला,
जो  कलंदर नज़र आता था, सिकंदर निकला.

शांत एसा था कि  तल्लीन 'ऋषि' हो जैसे, 
और  बिफरा तो 'सुनामी' सा समंदर निकला.

यूं 'उछल-कूद' की आदत है सदा से उसमे, 
उसके पुरखे को जो खोजा तो वो बन्दर निकला.

'साब' बाहर है, मुलाकात नहीं हो सकती,
'Raid'  आई तो बिचारा वही घर पर निकला.

उम्र  भर जिसको संभाले रखा हीरे की तरह,
वक्ते मुश्किल जो निकाला तो वो पत्थर निकला.



हम 'अनुबोम्ब' तो रखते ही है, फौड़ेंगे उसे,
'भिनभिनाता हुआ, इक पास से 'मच्छर' निकला. 



mansoor ali hashmi 

Friday, June 24, 2011

Reincarnation !!!


हड़बड़ी ही हड़बड़ी !


फिर जनम होगा - न होगा बात जब ये चल पड़ी,*   
सौ ब्लॉगर कूद आये, मच गयी है हड़बड़ी .

'आस्तिक' की बात को लेकर परीशाँ  'नास्तिक,
एक को दूजे में दिखने लग गयी है गड़बड़ी.

'मुस्कराहट' मुझको अपनी इस तरह महँगी पड़ी,
दाँत चमकाने कि ख़ातिर COLGATE लेनी पड़ी.  

पासपोर्ट बनवाना भी मुझको बहुत महंगा पड़ा ,
शाला से थाने तलक जब रिश्वते देनी पड़ी !

दोस्तों 'टिप्याना' भी मुझको तो रास आया नहीं,
कितनी ही कविताए मैरी आज तक सूनी पड़ी.

चित्र अपने ब्लॉग पर तकलीफ का बाईस बना,
याद 'दादा जान' आये, देखी जब दाढ़ी मैरी !

खूबसूरत लेख था, सूरत से लगती जलपरी,
कद्दू से मोटी वो निकली, लगती थी जो फुलझड़ी. 


* http://zealzen.blogspot.com/2011/06/blog-post_22.html?showComment=1308888740834#c3518290395088571464
 

mansoor ali hashmi 

Tuesday, June 21, 2011

Pandora of Knowledge !!!


ज्ञान का सोपान 


अपना-अपना ध्यान रख लीजे,
मिल रहा मुफ्त 'ज्ञान' रख लीजे.

सुगबुगाहट 'अपातकाल' सी फिर, 
बंद अपनी ज़ुबान  रख लीजे.

चाँद दिखलाते 'वो' हथेली पर,
'दूर-द्रष्टा' है 'मान' रख लीजे.

इतनी नजदीकियां नहीं अच्छी,
फासला दरमियान रख लीजे.

'फैसला' जिस जगह पे बिकता हो,
नाम उसका 'दुकान' रख लीजे.

जाने कब तोड़ना पड़े अनशन,
साथ में खान-पान रख लीजे.

योग तो बाद में भी कर लेंगे,
पहले लिख कर बयान रख लीजे. 

'सूद' से गर परहेज़  करते है,
 नाम उसका 'लगान' रख लीजे.

अस्ल से बढ़ के सूद लाएगा,
क़र्ज़ दीजे, पठान रख लीजे.

गांधीवादी ! तो बनिए बन्दर से,
बंद मुंह, आँखे, कान रख लीजे.

यादे माज़ी में गुम रहो बेशक,
साथ कुछ वर्तमान रख लीजे.

है अंदेशा बहुत भटकने का,
साथ गीता-कुरान रख लीजे.

बात ललुआ से कर रहे है आप,
साथ में पीकदान रख लीजे.

बन ही जायेगा 'लोकपाली बिल'  
कुछ यकीं कुछ गुमान रख लीजे.

'गल' न कर छूट जाएगी 'गड्डी',
झट से अपना 'समान' रख लीजे.

है हर इक दायरे से ये बाहर,
मुफ्त मिलता है 'दान' रख लीजे.

देश हित में सफ़र ! मुबारक हो,
साथ में खानदान रख लीजे.

वोट पैसो से अब नहीं मिलता,
साथ में पहलवान रख लीजे.

२०-२० का ये ज़माना है,
घर के नीचे दुकान रख लीजे.

mansoor ali hashmi 

Friday, June 17, 2011

Fasting...!


अनशन ही अनशन 

सच की पगड़ी हो रही नीलाम है,
'भ्रष्ट' को अब मिल रहा इनआम है.

अब 'सियासत' अनशनो का नाम है,
देश से मतलब किसे! क्या काम है?

तौड़ कर अनशन भी शोहरत पा गया ,
एक* मर कर भी रहा गुमनाम है!          [*निगमानंद]

दूसरे अनशन की तैयारी करो,
गर्म 'लोहे' का यही पैग़ाम है.

'अन्शनी' में सनसनी तो है बहुत,
'फुसफुसा' लेकिन मगर अंजाम है. 

'आग्रह सच्चाई का'  करते रहो,
झूठ तो, नाकाम है-नाकाम है.

स्वार्थ को ऊपर रखे जो देश के,
दूर से उनको मेरा प्रणाम है.

-- मंसूर अली हाश्मी 

Monday, June 6, 2011

क्यूँ चारो तरफ फैला है भरम?


क्यूँ  चारो तरफ फैला है भरम?

'अन्ना' पे करम, 'बाबा' पे सितम ,
'अम्मा' इस तरह करना न ज़ुलम!

'पैसा' है सनम, 'योगा' से शरम,
'मन'* है तुझको कैसा ये भरम ?           [*PM]

'भगवे' से हुआ ख़तरा पैदा,
'शलवार'* ने रखली 'उनकी' शरम.        *[बाबा रामदेव]

रक्षा करना थी देश की जब,
'आँचल' को बना डाला परचम.

स्वागत करके लाये थे जिसे,
छोड़ा उसको हरि  के द्वारम.

'अनशन' करने से रोको नही,
'सेवा' करना ही जिनका 'धरम'.
-- mansoor ali hashmi