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Tuesday, August 31, 2010

ख़बरों का अकाल

ख़बरों का अकाल 
कैटरीना को अब भी बेहद चाहते हैं सलमान... - 'आज तक'
-३०-०८-१० 

कोई खबर नहीं थी  तो ये भी खबर बनी,
 " 'सल्मां' के दिल से 'केट' तो निकली नहीं अभी."
पहने हुए 'कमीस' थे जाती भी किस तरह,
'शर्ट-इन' था और वोह भी तो दुबली नहीं अभी!
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कॉमनवेल्थ जीओएम को नहीं भाया थीम सांग.... -आज तक [३०-०८-१०]
[कॉमनवेल्थ के इस थीम सांग से जीओएम ही नहीं बल्कि विपक्ष भी संतुष्ट नहीं है. सबका मानना है कि इस गाने में उतनी जान ही नहीं है, जैसी रहमान से उम्मीद होती है.
इस गाने के लिए ए. आर. रहमान को 5 करोड़ रुपए दिए गए थे. और गेम्स समिति का दावा था कि थीम सांग शकीरा के वाका-वाका से कम नहीं होगा. सवाल ये है कि जीओएम और विपक्ष को ही जब थीम सांग नहीं भा रहा है तो ये पब्लिक को कितना पसंद आएगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.]

कुछ और 'चूना' मिल गया लगने वास्ते,
'पैसे'* तो कर ही लेते है ख़ुद अपने रास्ते, [५ करोड़]
वैसे तो 'वाका-वाका' से कुछ कम नहीं है ये,
इसमें 'शकीरा' होती तो हम भी थे नाचते.
  mansoorali hashmi

Monday, August 30, 2010

अब........ / NOW..

अब........

'पर-दर्शन' को एब समझते थे पहले,
'प्रदर्शन' ही रोज़ का अब मामूल हुआ.

'तलवारे' तो  पहुँच गयी है म्यूजियम* में, [*अंग्रेजो की]
अब धर्मो का रक्षक याँ त्रिशूल हुआ.
 
धरम, दया की यारी अब तो टूट रही,
हिंसा से वह लड़ने में मशगूल हुआ.

रिश्वत से अब कम ही उलझन होती है,
ली, दे दी! जब सबब कोई माकूल  हुआ. 

--mansoorali hashmi

Sunday, August 29, 2010

'न' होने का होना.....!

'न' होने का होना.....!

'कुछ नहीं' थे ये तसल्ली फिर भी है,
'शून्य' से संसार की रचना हुई.

कहकशां  दर  कहकशां खुलते गए,
क्या अजब ये देखिये घटना हुई.

आदमी- सूरज बना, औरत- ज़मीं,
इस तरह से आमदे 'चंदा' हुई.

सिलसिला दर सिलसिला ये ज़िन्दगी,
ज़िन्दगी  की  चाह में पुख्ता  हुई.
 
बढ़ गयी आबादी, ताकत भी बढ़ी,
फिर खुराफातें यहाँ बरपा हुई.

रंगों, मज़हब, नस्ल के झगडे हुए,
ज़हर फैला, खूँ की बरखा हुई.

फिर तलाशे ज़िन्दगी तारो में है!
'ज़िन्दगी', लो ! एक मृग-तृष्णा हुई.

एक सपने की हकीक़त ये रही,
इक हकीक़त आज फिर सपना हुई.

'कुछ नहीं थे' ये तसल्ली फिर भी है..........
mansoorali hashmi

Saturday, August 28, 2010

क्या करे!


क्या करे!

कभी तूने किसी से कुछ करी क्या 'बेवफाई'  है?
न करना ज़िक्र इसका, इसको कहते 'बेहयाई'  है.

कोई लिख देगा 'नोवेल' या बना देगा फिलम कोई!
'छिनाली' करके भी लोगों ने याँ दौलत कमाई है!!

फिलम की तरह क्यों रीवर्स चलने लग गयी गाड़ी,
हनीमून, बाद में शादी, और आखिर में सगाई है.

 'गुटरगूँ'   करने से पहले समझ ले गौत्र की गुत्थी,
सुना है 'खाप' वालो ने "बड़ी सख्ती" दिखाई है.

अगर बच जाये बेलन से तो बे परवाह मत होना, 
अभी तो हाथ में झाड़ा है,करछी है, कढ़ाई है.

"उसे"  कंधार जा के छोड़ आये, जान तो छूटी!
"यहाँ बैठा" तो बनता जा रहा अब घर जमाई है!!

जो प्रजा है, वही राजा करेगा कौन अब इन्साफ? 
यह 'नक्सलवाद' है या ख़ुद से ख़ुद की ही लड़ाई है??
-mansoorali hashmi

Friday, August 27, 2010

असमंजस

असमंजस 

रंगों में आतंक भरा है!
भगवा कोई लाल, हरा है.

बेरंगी होना ही अच्छा,
इन्द्र धनुष से तीर चला है,

'मस्जिद' गरचे टूट चुकी है,
बेघर अब भी 'राम लला' है.
बंद है मुट्ठी में जाने क्या! [court verdict]
पत्थर या कि गुड़ का डला है.

महंगाई ! तो घटती, बढ़ती,
देश का कारोबार बढ़ा  है.

रेखा* से नीचे वालो में,  [*BPL]
सपनो का ब्योपार बढ़ा है. 

'राय' पे 'कालिख' का चढ़ जाना!
'साहित्य' भी तो एक 'कला'  है !!

संस्कारो का पैमाना क्या?
एक गधी की आत्म-कथा है !

'अफज़ल' को जल्लाद न मिलता,
कृषक सूली पर टंगा है!

'जयचंद' या 'माधुरी गुप्ता',
अपनों ही ने हमको छला है.

बारहा प्यारा अपना गुलशन,
अपनों ही के हाथ जला है.
मंसूर अली हाश्मी 

Wednesday, August 25, 2010

कुछ काम करो - कुछ काम करो !

कुछ काम करो - कुछ काम करो !


भ्रष्टाचार   
# "काम न"  करके "वेल्थ" अर्जित कर, [c.w]

   सीख ले आर्ट कुछ तो सर्जित कर.
# दूध का कारोबार 'मंदा' है?
   फिर तो पानी में दूध मिश्रित कर.

हिंदी साहित्य  
# 'बे हयाई' भी अब तो बिकती है,
   'बे वफाई' पे "शोध" मुद्रित कर.
# बहस जब छिड़ गयी 'छिनालो' की,
   कौन  किस से बड़ा ये साबित कर!
# गाली देकर तू मांग ले माफ़ी, 
   छप गया है ग़लत तो एडिट कर.
# लिखना पढ़ना तो सब को आता है,
   'बोल कर' ही तू सब को भ्रमित कर.

समाज
# आश्रमों से ये अब सबक मिलता,
   'भोग ख़ुद', दूसरो को वर्जित कर.
# "बाँध" रस्सी से "दिखला" गहराई!
    पेश्तर "डूबने" से uplift  कर!!
# "देश" पहले कि "धर्म" और "भाषा"?
  सोच ले, इसके बाद खिट-खिट कर.
# हिंदी-उर्दू है दो सगी बहने,
   एक गमले  ही में पल्लवित कर.
# "गांधी-गीरी" अगर चलानी है,
   'मुन्नाभाई' किसी को 'सर्किट' कर
# 'पीपली' को मिला नया जीवन,
  अब, तू 'बरगद' पे ध्यान केन्द्रित कर.
# 'सेक्स वर्कर' भी अब तो है 'उद्धोग',
  कर न, हड़ताल इसको "गर्भित कर".  
# 'चीनी कम' , उम्र हो गयी ज़्यादा,
  'बातों' से अब 'मिठास' सिंचित कर.

राजनीति

# 'मंदिर' 'अफज़ल' बड़े कि सत्ता-सुख!
  प्रकरण ऐसे सारे लंबित कर!!
#  "जूता मारे", गले लगा उसको,
  तू हरीफो को अपने विस्मित कर.
# जीतना है अगर चुनाव तुम्हे,
  बातें सारी कपोल- कल्पित कर.
# राजनीति से हो  'रजो-निवृत्त'?
  "राज्यपाली" से ख़ुद को नियमित कर.
स्वतंत्रता दिवस के महीने में 
अस्पतालों में 'फल' हुए तकसीम,
'सांसदों' को न इससे वंचित कर!
 [ तनख्वाह बढ़ा दे अल्लाह के नाम पर]
-मंसूर अली hashmi

Thursday, August 19, 2010

इस रंग बदलती दुनिया में......

इस रंग बदलती दुनिया  में......

नक़ाबो में कईं चेरे छिपे है,
नज़र है जैसी वैसा ही दिखे है.

कोई 'लाली' से 'आतंकित' किसी को,
'हरा' सब 'सांप' के जैसा लगे है.

जो 'तप' और 'त्याग' का प्रतीक था अब,
वही 'भगवा' क्यों 'संसारी' लगे है.

'सफेदी' थी 'मुक़द्दस'* की ज़मानत,  [*पवित्रता की]
कईं 'धब्बे' अब इस पर भी लगे है.

'गुलाबी' में मोहब्बत की कशिश थी,
क्यों 'कांटो' सी 'निगाहों' को चुभे है?

कभी 'नीला' समंदर दिलरुबा था,
लबालब 'ज़हर'* का दरिया लगे है.   [polluted हो कर]


फ़िज़ा की खुशगवारी क्या हसीं थी,
धुआँ हर सिम्त ये कैसा उठे है?
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चार लाईने हिंदी की आज की साहित्यिक संस्कृति पर:-
तराने, राग थे, किलकारियां थी,
हवस है आग है चिंगारियां है !
ये कैसी "छीना-झपटी" कि उड़ी है,
हमारी अस्मिता की धज्जियां है !!

-मंसूर अली हाशमी 

Wednesday, August 18, 2010

बातों-बातों में

बात निकली तो हरएक बात पे कुछ याद आया!  




 Mansoorali Hashmi

 to उडन तश्तरी.... 


समीर जी प्यारी ग़ज़ल कही आपने, ख़ुद को दिलासा आदमी यूं भी दे लिया करता है, जश्ने आज़ादी के मौके पर अत्यंत ही निराशाजनक तस्वीर पेश की गई ब्लॉगर जगत में, देश की एवं मौजूदा हालात की. कुछ लोगो को तो लगता है कि सब कुछ ही ख़त्म हो गया है. ऐसे में आपने एक अच्छा 
सपना भी देखा है और उसमे कोई अपना भी देखा है:-  "मुद्दतो बाद कोई आने लगा अपने सा,  रात भर ख़्वाब में मैंने उसे आते देखा." बहुत ख़ूब.

                               "मुद्दतो बाद सही  कुछ तो हुआ आपके साथ" 
 आपके हर शेर ने कुछ  कहलवा लिया है, इजाज़त हो तो अपनी पोस्ट पर दाल दूँ आपकी रचना के साथ? 
Starred

Sameer Lal

 to me

हज़ूर


आप भी गज़ब करते हैं-सम्मान का विषय है मेरे लिए और आप को पूछने की कैसे जरुरत आन पड़ी. आपका अधिकार और स्नेह है. जरुर छापें.
बेहतरीन उभरे हैं आपके हर शेर. वाह
सादर  -समीर 
समीर लाल जी                                                                                                                                 हाश्मी                                                                                 
मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा                     धूप से आँख मिचोली का भी मौक़ा तो मिला
धूप को आज यूँही नज़रे चुराते देखा                सर्द रिश्तो को कही पर तो पिघलते देखा 

मुद्दतों  बाद हुई आज ये कैसी हालत               ख़ुश्क आँखों को नमी का भी तो अहसास हुआ
आँख को बे वजह आंसू भी बहाते देखा            दर्द बन कर जो इन आंसू को टपकते देखा

मुद्दतों बाद दिखे है वो जनाबे आली                वोट के ही तो सवाली है, "बड़ी बात है यह" 
वोट  के वास्ते सर उनको झुकाते देखा            हाकिमे वक़्त को आगे तेरे झुकते देखा

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने               नींद आ जाए ये नेअमत है बड़ी चीज़ यहाँ
ख़ुद  को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा           और सोने पे सुहागा तुझे जगते देखा 

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने            खुशनसीबी है कि भाई भी है अपना कोई
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा                 अब जो 'दीवार' है, "उसको भी तो गिरते देखा"

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा                खवाब में ही सही अपनों से मुलाक़ात तो की
रात भर खवाब में मैंने उसे आते देखा               उनके शिकवो को शिकायात को झड़ते देखा

मुद्दतों  बाद किसी ने यूं पुकारा है "समीर"        देर से "हाशमी" पर तुझको पुकारा तो सही 
ख़ुद ही ख़ुद से पहचान कराते देखा                    ख़ुद की पहचान को यूं भी तो निखरते देखा.  
  
Regards.

-मंसूर अली हाश्मी.
 

Sunday, August 15, 2010

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मैरी..

लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मैरी..


सुलभ जायसवाल की तमन्नाएं ..... "आज़ाद वतन में मुझको आज़ाद घर चाहिए"

पढ़कर , उनके लिए ये दुआइय कलेमात  पेश है:-
[ स्वतंत्रता दिवस पर सभी ब्लॉगर साथियों और देश वासियों को हार्दिक  बधाईयाँ]

शहरे आज़ाद में तुम को घर भी मिले,
घर मिले, साथ में तुमको वर* भी मिले.  [*जोड़ी] 
बे ख़तर  जो हो, वह रहगुज़र भी मिले,
द्वार पर राह तकती नज़र भी मिले.
गूँजे घंटी जहाँ साथ आज़ान के,
कारोबारी वहां हर बशर भी मिले.

हुक्मराँ  हो वफादार अब देश में,
हाथ में हो तिरंगा जिधर भी मिले.
mansoorali hashmi

Saturday, August 14, 2010

समुन्द्र पार से शौहर का ख़त

समुन्द्र पार से शौहर का ख़त 


इन दिनों  पच्चीस साल बाद दो बारा इस मुल्क 'कुवैत' में पहुँच कर लग रहा है कि जहाँ तक आप्रवासियों की स्थिति है अधिक कुछ भी नहीं बदला, जबकि ये देश अब अपनी तरक्की के चरम पर है. ७० के दशक में एक पाकिस्तानी शायर [नाम अब याद नहीं रहा है] जो ख़ुद भी अप्रवासी थे ने यह  नज़्म लिखी थी जो उस वक़्त यहाँ के एक स्थानीय अखबार अरब टाईम्स [इं[ग्लिश/उर्दू]  में छपी थी.अप्रवासियो की व्यथा बयान करती हुई . मैंने भी अपनी श्रीमती को इरसाल करदी थी, नतीजतन वतन वापसी की राह आसान हो गयी थी......पेश कर रहा हूँ:-
तुम्हारा नामा-ए उल्फत मुझे कल मिल गया प्यारी
पढ़ी जब लिस्ट चीज़ों की कलेजा हिल गया प्यारी
वही तकरार तोहफों की वही फरमाइशें सबकी
लिखी है गोया ख़त में सिर्फ तुमने ख्वाहिशें सब की
सभी कुछ लिख दिया तुमने किसी ने जो लिखाया है
फलां ने ये मंगाया है, फलां ने वो मंगाया है.

कभी सोचा भी है तुमने रूपे केसे कमाता हूँ
कड़कती धूप सहता हूँ पसीने में नहाता हूँ
मगर तुम हो कि, रिश्तेदारियां मल्हूज़ रखती हो
लुटा कर अपने ही घर को इन्हें महफूज़ रखती हो
जो पैसा पास हो रिश्ते भी सोये जाग जाते है
बुरा जब वक़्त आता है तो फिर सब भाग जाते है.

मैं पहुंचूंगा तो फिर तुम देखना असली लुटेरो को
गले मिलते है कैसे  देखना फसली बटेरो को 
पहुँच जाएंगे ये सब लोग झूठी चाह में ऐसे
भंडारा बंटने  वाला हो किसी दरगाह में जैसे
कोई कैसे कहे ये बात इन मौक़ा परस्तो से 
रूपे लगते नही इस मुल्क में किबला दरख्तों पे 

तुम्हारी ख्वाहिश ऎसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
मगर कहना खुदा लगती कभी नाकाम हम निकले?
कहा तुमने मुझे जो कुछ वही कुछ कर दिया मैंने 
तुम्हारे अगले पिछलो को भी अब तो भर दिया मैंने
मुझे 'कुवैत'  आके , अब तो दसवां साल है प्यारी
वतन से दूर हूँ कब से शिकस्ता हाल है प्यारी.

मगर तुम हो कि बस फिर भी यही तकरार करती हो
करो इक और एग्रीमेंट यही इसरार करती हो 
हवास ज़र की खुदा जाने कहाँ ले जायेगी हमको
ख़ुशी मिल जुल के रहने की ना मिलने पाएगी हमको
मैरे भी दिल में आता है मैरी इज्ज़त करे बच्चे
थका हारा जो लौटू, मिरी खिदमत करे बच्चे.

मै होता हूँ जो घर पे तो बहुत तस्वे बहाते है
मिरे जाते ही वो कमबख्त गुलछर्रे उड़ाते है
जिसे बिजनेस करना था जुवारी बनता जाता है
बनाना था जिसे पायलट शिकारी बनता जाता है
मिरे ही अपने बच्चे मुझसे यूं अनजान रहते है
बजाए मुझको अब्बू के वो मामूजान कहते है.

खुदा के वास्ते प्यारी यहाँ से जान छुड़वादो 
मिरी औलाद को लिल्लाह, मिरी पहचान करवादो
तुम अपने आप को देखो जवानी ढलती जाती है
तुम्हारी काली ज़ुल्फों में सफेदी बढ़ती जाती है 
 फ़िराक-ओ-हिज्र के सदमे को पत्थर बन के सहती हो
सुहागन हो के भीतुम हैफ! बेवा बनके रहती हो.

हुवा चलना भी अब दुशवार ढांचा बन गया हूँ मैं 
कभी सोना था पांसा, आज तांबा बन गया हूँ मैं
लुटाना छोड़ कर दौलत , किफ़ायत भी ज़रा सीखो
बहुत कुछ बन गया घर का क़नाअत भी ज़रा सीखो
दुआ करना रिहा जल्दी तुम्हारा ख्स्म* हो जाए
सजा ये मुल्क बदरी कि, मिरी अब ख़त्म हो जाए


*शौहर 

Friday, August 13, 2010

ऐसे तो न थे हम!


                              "छिनरा कोई, छिनाल, छलावा लगे कोई "

'छिनाल' पर बहस रुकने क नाम नही ले रही, ख़ूब 'छीछालेदार' हो रही है, तथाकथित बुद्धिजीवी साहित्यकारों की. 'छत्तीस' के आंकड़े वालो को भिड़ने का ख़ूब अच्छा बहाना मिल गया है. 'छाती' ठोंक कुछ 'छुट-भय्ये' भी मैदान में कूद पड़े है. ख़ूब 'छकिया' रहे है एक-दूजे को. इतने 'छक्के' तो T-20 में भी नहीं लगे थे. 'छलनी' जितने 'छिद्र' निकल आये है हमारी साहित्यिक संस्कृति में, जिसकी गरिमा पर गहन चिंतन करते हम अघाते नही. एक सभ्य ! व्यक्ति के 'छिनाल' शब्द प्रयुक्त कर लेने पर सभी को जैसे 'गाली-गलौच'  की 'छूट' सी मिल गयी है.
'छद्मरूप' धारी  टिप्पणी कर्ता भी ख़ूब मज़ा ले रहे है, इस भिड़ंत का. अजीब मन: स्थिती हो रही है इन दिनों, हिंदी साहित्य पढ़ने, मनन करने पर भी शर्म सी महसूस हो रही है. क्या कोई गंभीर साहित्यकार या साहित्य  के शुभ-चिन्तक आगे आकर इस 'छिनाली' संस्कृति से हिंदी साहित्य को मुक्त करवाएगा ? 

-मंसूर अली हाश्मी