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Saturday, April 24, 2010

आडम्बर

अजित वडनेरकर जी,
 आज[२४-०४-१०/shabdon ka safar]  फिर आपने प्रेरित  किया है , आडम्बर के लिए, विडम्बना के साथ खेलना पड़ रहा है:-
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I [मैं]  P ह L ए 
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आ ! डम्बर-डम्बर खेले,
वो मारेगा तू झेले , 


जो हारेगा वो पहले,
ज़्यादा मिलते है ढेले*      [*पैसे]


देखे  है ऐसे मेले,
बूढ़े भी जिसमे खेले!


आते है छैल-छबीले,
बाला करती है बेले ,     


मैदाँ वाले तो  नहले,
परदे के पीछे दहले.


जब बिक न पाए केले*    [*केरल के]
वो बढ़ा ले गए ठेले.


"मो"हलत उनको जो "दी" है,
उठ तू भी हिस्सा लेले.  


-mansoor ali hashmi 
http://aatm-manthan.com 

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