Monday, June 29, 2009

गुलचीं से फरयाद


''खुशफहमी'' समीर लालजी के दुःख पर [२८.०६.०९ की पोस्ट पर]

चिडियों को अच्छा न लगा,
आपका वातानुकूलित बना रहना,
वें सोचती थी; गुस्साएगे आप,
निकल आयेंगे बगियाँ में,
जब कुछ फूल नष्ट होने पर भी आप न गुस्साए,
और न ही बाहर आये,
तब वे ही गुस्सा गयी.....

वें मिलने आप से आई थी,
फूलो से नहीं,
आपने गर्मजोशी नहीं दिखाई,
अनुकूलित कमरे में,
मन में भी ठंडक भर ली थी आपने.

ऎसी ही उदासीनता का शिकार,
आज का मनुष्य हुआ जा रहा है,
अपना बगीचा उजड़ जाने तक.

काश! चिडियाएँ,
हमारा व्यवहार समझ पाती.
-मंसूर अली हाशमी

7 comments:

admin said...

बहुत गहरी बात कही है आपने। बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Udan Tashtari said...

काश! चिडियाएँ,
हमारा व्यवहार समझ पाती.

-बस, यही दुआ करता हूँ.

बहुत बेहतरीन!

दिनेशराय द्विवेदी said...

समीर भाई को शानदार भेंट दी है आप ने।

Vinay said...

बहुत सुन्दर कविता

---
चर्चा । Discuss INDIA

M Verma said...

चिंता है तो चिंतन भी है
बहुत खूब ---

M Verma said...

चिंता है तो चिंतन भी है
बहुत खूब ---

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब हाशमी साहब...
समीर लाल कुछ जाने, कुछ अनजाने लगे...