Sunday, February 8, 2009

kaleidocopic view

 बनना 

बस्ती जब बाज़ार बन गयी,
हस्ती भी व्यापार बन गयी।

भिन्न,विभिन्न मतो से चुन कर,
त्रिशन्कु सरकार बन गयी।

लाख टके की बात सुनी थी,
सुन्दर नैनो कार बन गयी।














अपनी ही लापरवाही तो,
आतंक का हथयार बन गयी।

लोक-तन्त्र की जय-जय,जय हो,
राजनीति घर-बार बन गयी।
Note: {Pictures have been used for educational and non profit activies. 
If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.}
-मन्सूर अली हाशमी

8 comments:

"अर्श" said...

bahot hi umda likha hai aapne,bahot hi badhita byanga kasa hai aapne dhero badhai aapko...

arsh

mukti said...

its a butiful creation.i enjoyed reading.

शशिकान्त ओझा said...

तंज़ बढ़िया कहा आपने बहर में।

Vinay said...

बड़ी राजनीतिक ग़ज़ल है, वाह!

राज भाटिय़ा said...

मन्सूर अली हाशमी जी वाह क्या बात कही आप ने, बहुत सुंदर ,
धन्यवाद

अमिताभ मीत said...

बढ़िया है भाई.

नीरज गोस्वामी said...

मंसूर साहेब....क्या खूब कहा है...
लाख टके की बात सुनी थी,
सुन्दर नैनो कार बन गयी।
सुभान अल्लाह ...खूबसूरत ग़ज़ल...
नीरज

Birds Watching Group said...

wah ji ghar bar ki rajniti ur bar k kmaal